मंगलवार, 30 सितंबर 2014

सूरज क्या, तू संग लाया है?

सूरज! तू क्या संग लाया है?
आशाओं को,
क्या पीली किरणों में बिखराया है?
सूरज! तू क्या संग लाया है?

सांसें जो
बोझिल हैं अब तक
उनको क्या तू सहलाया है?
सूरज! तू क्या संग लाया है?



मरते मन में
क्या किरणें तेरी
ज्योति नई भर लाई हैं?
चंचल तन को क्या
स्निग्ध सुधा से नहलाई हैं?
सूरज! तू क्या संग लाया है?

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत कुछ ले के आती हैं सूरज की किरनें ... महसूस हो सके तो जीवन की ऊर्जा और प्रेरणा होती हैं इनमें ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति
    Recent Post ..उनकी ख्वाहिश थी उन्हें माँ कहने वाले ढेर सारे होते
    http://sanjaybhaskar.blogspot.in/2014/09/blog-post_28.html#links

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. धन्यवाद मित्र। आपने उत्साह बढाया। जी आपकी रचना बहुत अच्छी है।

      हटाएं
  3. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, रविवार, दिनांक :- 12/10/2014 को "अनुवादित मन” चर्चा मंच:1764 पर.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपको सादर आभार राजीव जी कि आपने कविता स्थान दिया।

      हटाएं
  4. Bahut hi sunder prastuti .... Suraj urja ka strot hai fir chaahe aashaao ka ho ya kuch aur ... Umdaaa ...lajawaab !!!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत धन्यवाद परी जी। जिसे मैंने लिखा उसे आपने मेरी आँखों में जैसे झाँक कर देख लिया। सादर आभार।

      हटाएं