सोमवार, 19 अप्रैल 2021

डरी रहती है

वो रह रहकर पूछती रहती है
ठीक तो हूँ मैं?

बहुत डरी रहती है
किसी अंजाने भय से!
कई बार
वो खुद को भी भूल जाती है
मेरी ही चिन्ता में
जैसे बहुत जरूरी हूँ मैं दुनिया के लिए!

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

फ्रैक्चर, प्लॉस्टर और चुनाव

अभी मैं उहापोह की स्थिति में पेंडुलम की तरह डोल ही रहा था कि चच्चा हाँफते हुए कहीं चले जा रहे थे। देखकर लगा कि चिढ़े हुए हैं। जैसे उन्होंने कोई भदइला आम जेठ के महीने में खा लिए हों और जहर की तरह दाँत से ज्यादा मन एकदम ही खट्टा हो गया हो। जब मैंने उनकी गाड़ी को अपने स्टेशन पर रुकते नहीं देखा तो मैंने चच्चा को जोर से हॉर्न देते हुए बोला,


‘अरे चच्चा! कहाँ रफ्फू-चक्कर हुए फिर रहे हैं। पैर की चकरघिरन्नी को थोड़ी देर के लिए मेरे स्टॉप पर रोकिए तो सही! क्या पता कोई सवारी ही मिल जाए?’

चच्चा पहले तो गच्चा खा गए कि बोला किसने लेकिन जैसे ही उनकी याददाश्त वापस लौटी तो खखार कर बोले, ‘तुम हो बच्चा! मैं समझा कि कोई और बोल रहा है?’

‘अरे चच्चा! ये गाड़ी लेकर कहाँ चले थे? चाची भी तो आजकल अपने मायके गई हुई हैं।’

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस

आज अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस है। मतलब अबतक की चली आ रही परंपरा के अनुसार एक इवेंट। सालगिरह टाइप का! यदि इसे इवेंटनुमा तरीक़े से देखा जाए तो बधाई तो बनती ही है। मतलब कुछ 'हार्दिक बधाई' या 'हार्दिक शुभकामना' जैसे परंपरागत परन्तु पॉप्युलर (शायद थोड़े प्रोग्रेसिव भी) जूमलों को आसमान में तो उछाला जाना ही चाहिए। और इस तरह इस वार्षिक इवेंट का इतिश्री रेवा खण्डे समाप्तः; बिल्कुल हिन्दी दिवस व पखवाड़े की तरह! वैसे इन जूमलों से कुछ हो ना हो परन्तु थोड़ी जनजागृति व थोड़ा माहौल तो बन ही जाता है और माहौल का अपना ही अंतर्निहित सुख होता है! शायद स्वार्गिक!

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

गले मुझको लगा लो ऐ दिलदार होली में - भारतेंदु हरिश्चंद्र

गले मुझको लगा लो ऐ दिलदार होली में
बुझे दिल की लगी भी तो ऐ यार होली में।

नहीं ये है गुलाले-सुर्ख उड़ता हर जगह प्यारे
ये आशिक की है उमड़ी आहें आतिशबार होली में।

गुलाबी गाल पर कुछ रंग मुझको भी जमाने दो
मनाने दो मुझे भी जानेमन त्योहार होली में।

है रंगत जाफ़रानी रुख अबीरी कुमकुम कुछ है
बने हो ख़ुद ही होली तुम ऐ दिलदार होली में।

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021

तन गई रीढ़ - नागार्जुन

झुकी पीठ को मिला
किसी हथेली का स्पर्श
तन गई रीढ़।

महसूस हुई कन्धों को
पीछे से,
किसी नाक की सहज उष्ण निराकुल साँसें
तन गई रीढ़।

कौंधी कहीं चितवन
रंग गए कहीं किसी के होठ
निगाहों के ज़रिये जादू घुसा अन्दर
तन गई रीढ़।

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

आवाज़ें - कुंवर नारायण

यह आवाज़
लोहे की चट्टानों पर
चुम्बक के जूते पहन कर
दौड़ने की आवाज़ नहीं है।

यह कोलाहल और चिल्लाहटें
दो सेनाओं के टकराने की आवाज़ है।

यह आवाज़
चट्टानों के टूटने की भी नहीं है
घुटनों के टूटने की आवाज़ है।

शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिये - गोपालदास 'नीरज'

है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए
जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए।

रोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरह
अब जनाज़ा ज़ोर से उनका निकलना चाहिए।

अब भी कुछ लोगो ने बेची है न अपनी आत्मा
ये पतन का सिलसिला कुछ और चलना चाहिए।

फूल बन कर जो जिया वो यहाँ मसला गया
जीस्त को फ़ौलाद के साँचे में ढलना चाहिए।

बुधवार, 20 जनवरी 2021

चाँद है ज़ेरे क़दम, सूरज खिलौना हो गया - अदम गोंडवी

चाँद है ज़ेरे क़दम सूरज खिलौना हो गया
हाँ, मगर इस दौर में क़िरदार बौना हो गया।

शहर के दंगों में जब भी मुफलिसों के घर जले
कोठियों की लॉन का मंज़र सलौना हो गया।

ढो रहा है आदमी काँधे पे ख़ुद अपनी सलीब
ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा जब बोझ ढोना हो गया।

यूँ तो आदम के बदन पर भी था पत्तों का लिबास
रूह उरियाँ क्या हुई मौसम घिनौना हो गया।

गुरुवार, 19 नवंबर 2020

सहमा सहमा डरा सा रहता है - गुलज़ार

सहमा सहमा डरा सा रहता है
जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है।

काई सी जम गई है आँखों पर
सारा मंज़र हरा सा रहता है।

एक पल देख लूँ तो उठता हूँ
जल गया घर ज़रा सा रहता है।

सोमवार, 20 अप्रैल 2020

जो तुम आ जाते एक बार - महादेवी वर्मा

जो तुम आ जाते एक बार

कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग

आँसू लेते वे पथ पखार
जो तुम आ जाते एक बार