रविवार, 16 जून 2019

क्रमशः प्रगति - शरद जोशी

खरगोश का एक जोड़ा था, जिनके पाँच बच्चे थे।

एक दिन भेड़िया जीप में बैठकर आया और बोला - असामाजिक तत्वों तुम्हें पता नहीं सरकार ने तीन बच्चों का लक्ष्य रखा है। और दो बच्चे कम करके चला गया।

कुछ दिनों बाद भेड़िया फिर आया और बोला कि सरकार ने लक्ष्य बदल दिया और एक बच्चे को और कम कर चला गया। खरगोश के जोड़े ने सोचा, जो हुआ सो हुआ, अब हम शांति से रहेंगे। मगर तभी जंगल में इमर्जेंसी लग गई।

शनिवार, 15 जून 2019

ऐसा लगता है ज़िन्दगी तुम हो - बशीर बद्र

ऐसा लगता है ज़िन्दगी तुम हो
अजनबी जैसे अजनबी तुम हो।

अब कोई आरज़ू नहीं बाकी
जुस्तजू मेरी आख़िरी तुम हो।

मैं ज़मीं पर घना अँधेरा हूँ
आसमानों की चांदनी तुम हो।

सोमवार, 10 जून 2019

कमजोर बुनियाद इमारत की - राजीव उपाध्याय

जब बुनियाद ही कमजोर थी
उस इमारत की
तो गिरना ही था उसे
हवा-पानी से।
वैसे भी
कोई कहाँ टिक सका है
हवा-पानी में।

इमारत गिरनी थी
गिर ही गई
पर वजह कुछ और थी,
वैसे तो खड़ी रह सकती थी
कुछ सदी और भी।

शुक्रवार, 7 जून 2019

प्रोफेसर - मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

आज फिर उनके सम्मान में हजरत रंजूर अकबराबादी एडीटर, प्रिंटर, पब्लिशर व प्रूफरीडर त्रैमासिक 'नया क्षितिज' ने एक शाम-भोज दिया था।

जिस दिन से प्रोफेसर काजी अब्दुल कुद्दूस, एम.ए., बी.टी. गोल्ड मैडलिस्ट (मिर्जा का कहना है कि यह पदक उन्हें मिडिल में बिना नागा उपस्थिति पर मिला था) यूनिवर्सिटी की नौकरी से त्यागपत्र देने के बाद बैंक ऑफ चाकसू लिमिटेड में डायरेक्टर, पब्लिक रिलेशन्स एंड एडवरटाइजिंग की हैसियत में धाँस दिए गए थे, उनके सम्मान में इस तरह के शाम-भोज, स्वागत-समारोह और डिनर दैनिक दफ्तरी जीवन का तत्व बल्कि जीवन का अंग बन गए थे। घर पर नेक कमाई की रोटी तो केवल बीमारी के समय में ही बरदाश्त करते थे, वरना दोनों समय स्वागत-भोज ही खाते थे। बैंक की नौकरी प्रोफेसरश्री के लिए एक अजीब अनुभव साबित हुई, जिसका मूल्य वो हर तरह से महीने की तीस तारीख को वसूल कर लेते थे।

मंगलवार, 4 जून 2019

कितने पथिक - राजीव उपाध्याय

मैं पथ बन
हर पल खड़ा हूँ
कितने पथिक
आए-चले गए।

कुछ देर तक ठहरे
कुछ गहरे कहीं तक उतरे
और पल में कुछ
कहानी नई कर गुजरे।
कितने पथिक
आए-चले गए॥

रविवार, 2 जून 2019

चौकीदार - मिरियम वेडर

 तंग-संकरी गलियों से गुजरते
धीमे और सधे कदमों से
चौकीदार ने लहरायी थी अपनी लालटेन
और कहा था - सब कुछ ठीक है

बंद जाली के पीछे बैठी थी एक औरत
जिसके पास अब बचा कुछ भी न था बेचने के लिए
चौकीदार ठिठका था उसके दरवाजे पर 
और चीखा था ऊंची आवाज में - सब कुछ ठीक है

शुक्रवार, 31 मई 2019

आवारा भीड़ के खतरे - हरिशंकर परसाई

Image result for हरिशंकर परसाईएक अंतरंग गोष्ठी सी हो रही थी युवा असंतोष पर। इलाहाबाद के लक्ष्मीकांत वर्मा ने बताया – पिछली दीपावली पर एक साड़ी की दुकान पर काँच के केस में सुंदर माडल खड़ी थी। एक युवक ने एकाएक पत्थर उठाकर उस पर दे मारा। काँच टूट गया।आसपास के लोगों ने पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया? उसने तमतमाए चेहरे से जवाब दिया-हरामजादी बहुत खूबसूरत है।

हम ४-५ लेखक चर्चा करते रहे कि लड़के के इस कृत्य का क्या कारण है? क्या अर्थ है? यह कैसी मानसिकता है? यह मानसिकता क्यों बनी? बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ये सवाल दुनिया में भर में युवाओं के बारे में उठ रहे हैं-पश्चिम के सम्पन्न देशों में भी और तीसरी दुनिया के गरीब देशों में भी। अमेरिका से आवारा हिप्पी और’हरे राम हरे कृण्ण’ गाते अपनी व्यवस्था से असंतुष्ट युवा भारत आते हैं और भारत का युवा लालायित रहता है कि चाहे चपरासी का काम मिले,अमेरिका में रहूँ । ‘स्टेट्स’ जाना है यानि चौबीस घंटे गंगा नहाना है। ये अपवाद है। भीड़-की-भीड़ उन युवकों की है,जो हताश,बेकार और कुद्ध हैं। संपन्न पश्चिम के युवकों के व्यवहार और भारत के युवकों के व्यवहार में अंतर हैं।

गुरुवार, 30 मई 2019

लम्हे की कहानी - राजीव उपाध्याय

हर लम्हे की अपनी कहानी होती है। वो लम्हा भले ही हमारी नज़रों में कितना ही छोटा या फिर बेवजह ही क्यों ना हो पर उसके होने की वजह और सबब दोनों ही होता है। उसका होना ही इस बात की गवाही है। 

परन्तु हम गवाहियों की परवाह कहाँ करते हैं? हम तो बस उन चीजों के होने से ही इत्तेफाक़ रखते हैं जो हममें इत्तेफाक़ रखती हैं। और जो हममें इत्तेफाक नहीं रखतीं, उसका होना, ना होना, हमारे लिए कोई मायने नहीं रखता। हमारे लिए तो बस इतना ही महत्त्वपूर्ण है कि कौन, कितना दे सकता है और कितना ले सकता है? शायद इतना भर का ही कारोबार है। एक ऐसा व्यापार जो हमेशा ही घाटे का होता है। कुछ खोटी चीजों से जाने क्या-क्या बदल लेते हैं? 

गुरुवार, 23 मई 2019

चुनावी चक्कलस का मंत्र - राजीव उपाध्याय

सुबह सुबह की बात है (कहने का मन तो था कि कहूँ कि बहुत पहले की बात है मतलब बहुत पहले की परन्तु सच ये है कि आज शाम की ही बात है)। मैं अपनी रौ में सीटी बजाता टहल रहा था। टहल क्या रहा था बल्कि पिताजी से नजर बचाकर समय घोंटते हुए मटरगश्ती कर रहा था (इसका चना-मटर से कोई संबंध नहीं है परन्तु आप भाषाई एवं साहित्यिक स्तर पर कल्पना करने को स्वतंत्र हैं। शायद कोई अलंकार या रस ही हो जिससे मैं परिचित ना होऊँ और अनजाने में मेरे सबसे बड़े साहित्यिक योगदान को मान्यता मिलते-मिलते रह जाए)। तभी मेरी नजर चच्चा पर पड़ी जो एक हाथ में धोती का एक कोन पकड़े तेज रफ्तार में चले जा रहे थे जैसे कि दिल्ली की राजधानी एक्सप्रेस पकड़नी हो! मैंने भी ना आव देखा ना ताव; धड़ दे मारी आवाज,

मंगलवार, 16 अप्रैल 2019

मुक्कमल होने को शापित हैं - राजीव उपाध्याय


हर पीड़ा अपने आप में मुक्कमल होती है परन्तु जब वो नासूर बनकर चुपचाप रिसती चली जाती है तो वो जाने-अंजाने समय की दीवार पर एक नई कहानी लिख रही होती है जिसकी इबारतों में हमारी सांसों की स्याही अपना हुनर कुछ इस तरह दिखलाती है कि सब कुछ आँखों के सामने होता है और कुछ भी परदे से बाहर भी नहीं निकलता है। शायद जिन्दगी की तस्वीर कुछ यूँ करके ही मुक्कमल होना जानती है या फिर तस्वीरों में रंग शायद ऐसे ही भरा जाता है। या फिर हमारे दर्द का रंग चटक होकर आँखों से ओझल होना जानता है कि हम अपनी कहानियों के कुछ ऐसे पहलुओं से भी रूबरू हो सकें जो हमारे अपने लिए ही एक अचम्भा सा लगता है। कि यकीन ही नहीं होता कि कुछ ऐसे भी पहलु हैं हमारे अंतस के जिसे हमें बहुत पहले ही जान लेना चाहिए था।