बुधवार, 8 अप्रैल 2020

तुम्हारी ऐसी तैसी - माणिक वर्मा

हरा भरा यह देश तुम्हारी ऐसी तैसी
फिर भी इतने क्लेश तुम्हारी ऐसी तैसी

बंदर तक हैरान तुम्हारी शक्ल देखकर
किसके हो अवशेष तुम्हारी ऐसी तैसी

आजादी लुट गई भांवरों के पड़ते ही
ऐसे पुजे गणेश तुम्हारी ऐसी तैसी

सोमवार, 6 अप्रैल 2020

जिहाद - प्रेमचंद

बहुत पुरानी बात है। हिंदुओं का एक काफ़िला अपने धर्म की रक्षा के लिए पश्चिमोत्तर के पर्वत-प्रदेश से भागा चला आ रहा था। मुद्दतों से उस प्रांत में हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रहते चले आये थे। धार्मिक द्वेष का नाम न था। पठानों के जिरगे हमेशा लड़ते रहते थे। उनकी तलवारों पर कभी जंग न लगने पाता था। बात-बात पर उनके दल संगठित हो जाते थे। शासन की कोई व्यवस्था न थी। हर एक जिरगे और कबीले की व्यवस्था अलग थी। आपस के झगड़ों को निपटाने का भी तलवार के सिवा और कोई साधन न था। जान का बदला जान था, खून का बदला खून; इस नियम में कोई अपवाद न था। यही उनका धर्म था, यही ईमान; मगर उस भीषण रक्तपात में भी हिंदू परिवार शांति से जीवन व्यतीत करते थे। पर एक महीने से देश की हालत बदल गयी है। एक मुल्ला ने न जाने कहाँ से आ कर अनपढ़ धर्मशून्य पठानों में धर्म का भाव जागृत कर दिया है। उसकी वाणी में कोई ऐसी मोहिनी है कि बूढ़े, जवान, स्त्री-पुरुष खिंचे चले आते हैं। वह शेरों की तरह गरज कर कहता है-खुदा ने तुम्हें इसलिए पैदा किया है कि दुनिया को इस्लाम की रोशनी से रोशन कर दो, दुनिया से कुफ्र का निशान मिटा दो। एक काफिष्र के दिल को इस्लाम के उजाले से रोशनी कर देने का सवाब सारी उम्र के रोजे, नमाज और जकात से कहीं ज्यादा है। जन्नत की हूरें तुम्हारी बलाएँ लेंगी और फरिश्ते तुम्हारे कदमों की खाक माथे पर मलेंगे, खुदा तुम्हारी पेशानी पर बोसे देगा। और सारी जनता यह आवाज सुन कर मजहब के नारों से मतवाली हो जाती है। उसी धार्मिक उत्तेजना ने कुफ्र और इस्लाम का भेद उत्पन्न कर दिया है। प्रत्येक पठान जन्नत का सुख भोगने के लिए अधीर हो उठा है। उन्हीं हिंदुओं पर जो सदियों से शांति के साथ रहते थे, हमले होने लगे हैं। कहीं उनके मंदिर ढाये जाते हैं, कहीं उनके देवताओं को गालियाँ दी जाती हैं। कहीं उन्हें जबरदस्ती इस्लाम की दीक्षा दी जाती है। हिंदू संख्या में कम हैं, असंगठित हैं; बिखरे हुए हैं, इस नयी परिस्थिति के लिए बिलकुल तैयार नहीं। उनके हाथ-पाँव फूले हुए हैं, कितने ही तो अपनी जमा-जथा छोड़ कर भाग खड़े हुए हैं, कुछ इस आँधी के शांत हो जाने का अवसर देख रहे हैं। यह काफिष्ला भी उन्हीं भागनेवालों में था। दोपहर का समय था। आसमान से आग बरस रही थी। पहाड़ों से ज्वाला-सी निकल रही थी। वृक्ष का कहीं नाम न था। ये लोग राज-पथ से हटे हुए, पेचीदा औघट रास्तों से चले आ रहे थे। पग-पग पर पकड़ लिये जाने का खटका लगा हुआ था। यहाँ तक कि भूख, प्यास और ताप से विकल होकर अंत को लोग एक उभरी हुई शिला की छाँह में विश्राम करने लगे। सहसा कुछ दूर पर एक कुआँ नजर आया। वहीं डेरे डाल दिये। भय लगा हुआ था कि जिहादियों का कोई दल पीछे से न आ रहा हो। दो युवकों ने बंदूक भर कर कंधे पर रखीं और चारों तरफ गश्त करने लगे। बूढ़े कम्बल बिछा कर कमर सीधी करने लगे। स्त्रियाँ बालकों को गोद से उतार कर माथे का पसीना पोंछने और बिखरे हुए केशों को सँभालने लगीं। सभी के चेहरे मुरझाये हुए थे। सभी चिंता और भय से त्रास्त हो रहे थे, यहाँ तक कि बच्चे जोर से न रोते थे।

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

सिगरेट - अमृता प्रीतम

यह आग की बात है
तूने यह बात सुनाई है
यह ज़िंदगी की वो ही सिगरेट है
जो तूने कभी सुलगाई थी

चिंगारी तूने दे थी
यह दिल सदा जलता रहा
वक़्त कलम पकड़ कर
कोई हिसाब लिखता रहा

गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

रात के बारह बजे - माणिक वर्मा

रूप की जब की बड़ाई, रात के बारह बजे
शेरनी घेरे में आई, रात के बारह बजे

कल जिसे दी थी विदाई, रात के बारह बजे
वो बला फिर लौट आई, रात के बारह बजे

हम तो अपने घर में बैठे तक रहे थे चांद को
और चांदनी क्यों छत पे आई, रात के बारह बजे

मंगलवार, 31 मार्च 2020

प्रथम हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन : अध्‍यक्षीय भाषण - मदनमोहन मालवीय

प्रथम हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन : अध्‍यक्षीय भाषण - मदनमोहन मालवीय
मुझको बहुत से लोग जानते हैं कि मैं वाचाल हूँ लेकिन मुझको जब काम पड़ता है तब मैं देखता हूँ कि मेरी वाणी रुक जाती है। यही दशा मेरी इस समय हो रही है। प्रथम तो जो अनुग्रह और आदर आप लोगों ने मेरा किया है उसके भार से ही मैं दब रहा हूँ, इसके उपरान्‍त मेरे प्रिय मित्रों और पूज्‍य विद्वानों ने जिन शब्‍दों में मेरे सभापतित्‍व का प्रस्‍ताव किया है उसने मेरे थोड़े से सामर्थ्‍य को भी कम कर दिया है। सज्‍जनों! मैं अपने को बहुत बड़भागी समझता यदि मैं उन प्रशंसा वाक्‍यों के सौवें हिस्‍से का भी अपने को पात्र समझता जो इस समय इन सज्‍जनों ने मेरे विषय में कहे हैं। हाँ, एक अंश में मैं बड़भागी अवश्‍य हूँ। गुण न रहने पर भी मैं आपकी मंडली में गुणी के समान सम्‍मान पाता हूँ। इसी के साथ मुझको खेद होता है कि इतने योग्‍य और विद्वानों के रहते हुए भी मैं इस पद के लिए चुना गया। फिर भी मैं आपके इस सम्‍मान का धन्‍यवाद करता हूँ, जो आपने मेरा किया है। मेरा चित्त कहता है कि इस स्‍थान में उपस्थित होने के लिए हमारे हिन्‍दी संसार में अनेक विद्वान थे और हैं जिनमें कुछ यहाँ भी उपस्थि‍त हैं और जिनको यदि आप इस कार्य में संयुक्‍त करते तो अच्‍छा होता और कार्य में सफलता और शोभा होती। अस्‍तु, बड़ों से एक उपदेश सीखा है। वह यह है कि अपनी बुद्धि में जो आवे उस निवेदन कर देना। मित्रों की आज्ञा, मित्रों की मंडली का आज्ञा पालन करना मैं अपना परम धर्म समझता हूँ। अनुरोध होने पर अन्‍त में मैंने अपने प्‍यारे मित्रों से प्रेमपूर्वक निवेदन किया कि साहित्‍य सम्‍मेलन जिसका सभापति होने का सौभाग्‍य मुझे प्रदान किया गया है उसके कर्तव्‍य का पालन मेरा परम धर्म है। मैं आपसे दूर रहता हूँ। सो भी मैं कदाचित् निर्भय कह सकता हूँ कि हिन्‍दी साहित्‍य का रस पान करने में मुझको अन्‍य मित्रों की अपेक्षा कम स्‍वाद नहीं मिलता। उसके स्‍वाद लेने में मैं अपने किसी मित्र से पीछे नहीं। किन्‍तु अनेक कामों में रुका रहने के कारण मैं आपके बाहरी कामों का करने वाला सेवक हूँ। इस काम के लिए मैं अपने को कदापि योग्‍य नहीं समझता हूँ और इस अवसर पर जिसमें आपको पूर्व उन्‍नति के दृश्‍यों को देखना चाहिए था, जिनमें हिन्‍दी की भावी उन्‍नति का पथ प्रशस्‍त करना चाहिए था, किसी और ही मनुष्‍य को इस स्‍थान में बैठना चाहिए था, इसके योग्‍य मैं किसी प्रकार नहीं। अब यदि मैं इस स्‍थान में आकर आपकी आज्ञा पालन करने का यत्‍न न करूं तो उससे अपराध होता है। केवल इसी कारण मैं इस सम्‍मान का धन्‍यवाद देता हूँ और इस समय इस स्‍थान में आप लोगों की सेवा करने को तैयार हुआ हूँ।

रविवार, 29 मार्च 2020

कुफ़्र - अमृता प्रीतम

आज हमने एक दुनिया बेची
और एक दीन ख़रीद लिया
हमने कुफ़्र की बात की

सपनों का एक थान बुना था
एक गज़ कपड़ा फाड़ लिया
और उम्र की चोली सी ली

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

सोभित कर नवनीत लिए - अमृत राय

सोभित कर नवनीत लिए - अमृत राय हमारे बाप-दादे भी कैसे घामड़ थे जो मक्खन खाते थे। बताइए, मक्खन भी कोई खाने की चीज है! खट्टी-खट्टी डकारें आती हैं। पेट तूंबे की तरह फूल जाता है और गुड़गुड़ाने लगता है - कि जैसे अली अकबर सरोद बजा रहे हों या कोई भूत पेट के भीतर बैठा हुक्का पी रहा हो। और वायु तो इतनी बनती है, इतनी बनती है, कि चाहो तो उससे पवन-चक्की चला लो! क्या फायदा ऐसी चीज खाने से। दो ही चार महीनों में शरीर फूलकर कुप्पा हो जाता है - और अच्छा भला आदमी मिठाईवाला नजर आने लगता है, ढाई मन गेहूँ के बोरे जैसी तोंद और मुग्दर जैसे हाथ-पाँव। सिर्फ नजर आने की बात हो तब भी कोई बात नहीं। मुश्किल तो तब पैदा होती है जब पाँच कदम चलते ही दम फूलने लगता है जो इस बात की अलामत है कि दिल के लिए अब इस पहाड़ जैसी लहास को ढो पाना कठिन है। और अगर तब भी आदमी न चेता तो दिल थककर बैठ जाता है। उसी का नाम हार्ट-फेल है।

बुधवार, 25 मार्च 2020

मांगीलाल और मैंने - माणिक वर्मा

लोकतंत्र के लुच्चों, दगाबाज टुच्चों!
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और हरिजन,
जब हम हार गए तो काहे का इलेक्शन,
जिस देश की जनता हो तुम जैसी
वहां काहे की डेमोक्रेसी?

भितरघातियो, जयचंद के नातियों!
तुमने अंगूरी पीकर अंगूठा दिखाया है,
आज मुझको नहीं
मिनी महात्मा गांधी को हराया है!
हमारी हार बीबीसी लंदन से ब्रॉडकास्ट करवाई,
और ये खबर आज तक किसी अखबार में नहीं आई!
देश को आजादी किसने दिलवाई?
मांगीलाल और मैंने!

सोमवार, 23 मार्च 2020

साहित्य-बोध: आधुनिकता के तत्त्व - अज्ञेय

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'
शीर्षक में यह स्वीकार कर लिया गया है कि लेख का विषय 'साहित्य-बोध' है; पर वास्तव में इस अर्थ में इसका प्रयोग चिंत्य है। यह मान भी लें कि लोक-व्यवहार बहुत से शब्दों को ऐसा विशेष अर्थ दे देता है जो यों उनसे सिद्ध न होता, तो भी अभी तक ऐसा जान पड़ता है कि समकालीन संदर्भ में 'साहित्य-बोध' की अपेक्षा 'संवेदना-बोध' ही अधिक सारमय संज्ञा है। इसलिए शीर्षक में प्रचलन के नाम पर साहित्य-बोध का उल्लेख कर के लेख में वास्तव में आधुनिक संवेदना की ही चर्चा की जाएगी।

क्या संवेदना के साथ 'नई' या 'पुरानी' ऐसा कोई विशेषण लगाना उचित है? क्या संवेदना ऐसे बदलती है? क्या मानव मात्र एक नहीं है और इसलिए क्या उसकी संवेदना भी एक नहीं है? क्या यह एकता देश और काल दोनों के आयाम में एक-सी अखंडित नहीं रहती?

शनिवार, 21 मार्च 2020

पहचान - अमृता प्रीतम


तुम मिले
तो कई जन्म
मेरी नब्ज़ में धड़के
तो मेरी साँसों ने तुम्हारी साँसों का घूँट पिया
तब मस्तक में कई काल पलट गए!

एक गुफा हुआ करती थी
जहाँ मैं थी और एक योगी