सोमवार, 26 जुलाई 2021

कुर्सीनामा - गोरख पाण्डेय

1.

जब तक वह ज़मीन पर था
कुर्सी बुरी थी
जा बैठा जब कुर्सी पर वह
ज़मीन बुरी हो गई।

2.

उसकी नज़र कुर्सी पर लगी थी
कुर्सी लग गयी थी
उसकी नज़र को
उसको नज़रबन्द करती है कुर्सी
जो औरों को
नज़रबन्द करता है।

रविवार, 25 जुलाई 2021

ऐसा कुछ भी नहीं - कैलाश वाजपेयी

ऐसा कुछ भी नहीं जिंदगी में कि हर जानेवाली अर्थी पर रोया जाए।

काँटों बीच उगी डाली पर कल
जागी थी जो कोमल चिंगारी,
वो कब उगी खिली कब मुरझाई
याद न ये रख पाई फुलवारी।
ओ समाधि पर धूप-धुआँ सुलगाने वाले सुन!
ऐसा कुछ भी नहीं रूपश्री में कि सारा युग खंडहरों में खोया जाए।

शनिवार, 24 जुलाई 2021

टीवी पर भेड़िए - कुबेरदत्त

भेड़िए
आते थे पहले जंगल से
बस्तियों में होता था रक्तस्राव
फिर वे
आते रहे सपनों में
सपने खण्ड-खण्ड होते रहे।

अब वे टी०वी० पर आते हैं
बजाते हैं गिटार
पहनते हैं जीन
गाते-चीख़ते हैं
और अक्सर अँग्रेज़ी बोलते हैं

उन्हें देख
बच्चे सहम जाते हैं
पालतू कुत्ते, बिल्ली, खरगोश हो जाते हैं जड़।

गुरुवार, 22 जुलाई 2021

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है - कैफ़ी आज़मी

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है,
आज की रात न फ़ुटपाथ पे नींद आएगी,
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो,
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी।

ये जमीं तब भी निगल लेने को आमादा थी,
पाँव जब टूटती शाखों से उतारे हमने,
इन मकानों को ख़बर है न, मकीनो को ख़बर
उन दिनों की जो गुफ़ाओं में गुज़ारे हमने।

हाथ ढलते गए साँचों में तो थकते कैसे,
नक़्श के बाद नए नक़्श निखारे हमने,
की ये दीवार बुलन्द, और बुलन्द, और बुलन्द,
बाम-ओ-दर और ज़रा और निखारे हमने।

बुधवार, 21 जुलाई 2021

मजदूर का जन्म - केदारनाथ अग्रवाल

एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ!

हाथी सा बलवान,
जहाजी हाथों वाला और हुआ!
सूरज-सा इन्सान,
तरेरी आँखोंवाला और हुआ!!
एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ!

माता रही विचार,
अँधेरा हरनेवाला और हुआ!
दादा रहे निहार,
सबेरा करनेवाला और हुआ!!
एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ!

सोमवार, 19 जुलाई 2021

कहानी व किरदार - राजीव उपाध्याय

मेरी कहानी में
कई किरदार हैं;
कुछ तनकर खडे रहते हैं
और झुके रहते हैं कुछ सदा।
कुछ बेलगाम बोलते रहते हैं
कुछ बेजुबान जीव,
कुछ बातें बडी करते हैं
और कुछ बदजुबान।

रविवार, 18 जुलाई 2021

पहले अपना प्याला खाली करो

जापानी सदगुरु ‘नानहन' ने श्रोताओं से दर्शनशास्त्र के एक प्रोफेसर का परिचय कराया। उसके बाद अतिथि गृह के प्याले में वह उन प्रोफेसर के लिए चाय उड़ेलते ही गए। भरे प्याले में छलकती चाय को देख कर प्रोफेसर अधिक देर तक स्वयं को रोक न सके।
उन्होंने कहा- 'कृपया रुकिए! प्याला पूरा भर चुका है। उसमें अब और चाय नहीं आ सकती।'
नानइन ने कहा- 'इस प्याले की तरह आप भी अपने अनुमानों और निर्णयों से भरे हुए हैं। जब तक पहले आप अपने प्याले को खाली न कर लें, मैं झेन की ओर संकेत कैसे कर सकता हूँ?'

शनिवार, 17 जुलाई 2021

प्रतीक्षा - कुबेरनाथ राय

मन की धूप
कब की भटक गई अनजान गलियों में
मन का हाहाकार स्तब्ध
भीतर-भीतर कंठ दाब दिया

बाहर यह अशोक फूला है
बाहर दूर्वा का मुकुट पहन राह मुसकराती है
पर मैं खड़ा रहा
निहारते तुम्हारी बाट
जैसे कवि था खड़ा

शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

बड़की भौजी - कैलाश गौतम

जब देखो तब बड़की भौजी हँसती रहती है
हँसती रहती है कामों में फँसती रहती है।
झरझर झरझर हँसी होंठ पर झरती रहती है
घर का खाली कोना भौजी भरती रहती है।।

डोरा देह कटोरा आँखें जिधर निकलती है
बड़की भौजी की ही घंटों चर्चा चलती है।
ख़ुद से बड़ी उमर के आगे झुककर चलती है
आधी रात गए तक भौजी घर में खटती है।।

बुधवार, 14 जुलाई 2021

काश - श्रीकान्त जोशी

काश
दुनिया के तमाम मुल्क़
क़ायम रख पाते अपनी ताक़तें
अपनी अस्मतें
रहते अपने दायरों में,
अपनी-अपनी ज़मीनों पर ठहरते
ज़ोरों से कमज़ोरों पर ठहरते
ज़ोरों से कमज़ोरों के ज़ोर बनते
सूर्य-दिशा के देश
सूर्यास्तों के शिकार न होते।