बुधवार, 22 जनवरी 2020

आलस्य भक्त - गुलाब राय

अजगर करै न चाकरी, पंछी करे न काम।
दास मलूका कह गए, सबके दाता राम।।

प्रिय ठलुआ-वृंद! यद्यपि हमारी सभा समता के पहियों पर चल रही है और देवताओं की भांति हममें कोई छोटा-बड़ा नहीं है, तथापि आप लोगों ने मुझे इस सभा का पति बनाकर मेरे कुंआरेपन के कलंक को दूर किया है। नृपति और सेनापति होना मेरे स्‍वप्‍न से भी बाहर था। नृपति नहीं तो नारी-पति होना प्रत्‍येक मनुष्‍य की पहुंच के भीतर है, किंतु मुझ-ऐसे आलस्‍य-भक्‍त के लिए विवाह में पाणिग्रहण तक का तो भार सहना गम्‍य था। उसके आगे सात बार अग्नि की परिक्रमा करना जान पर खेलने से कम न था। जान पर खेल कर जान का जंजाल खरीदना मूर्खता ही है - 'अल्‍पस्‍य हेतोर्बहु हातुमिच्‍छन्, विचारमूढ: प्रतिभासि मे त्‍वम्' का कथन मेरे ऊपर लागू हो जाता। 'ब्‍याहा भला कि क्‍वांरा' - वाली समस्‍या ने मुझे अनेक रात्रि निद्रा देवी के आलिंगन से वंचित रखा था, किंतु जब से मुझे सभापतित्‍व का पद प्राप्‍त हुआ है, तब से यह समस्‍या हल हो गई है। आलसी के लिए इतना ही आराम बहुत है। यद्यपि मेरे सभापति होने की योग्‍यता में तो आप लोगों को संदेह करने के लिए कोई स्‍थान नहीं है, तथापि आप लोगों को अपने सिद्धांतों को बतला अपनी योग्‍यता का परिचय देना अनुचित न होगा।

सोमवार, 20 जनवरी 2020

एक कुत्ते की डायरी - प्रभाकर माचवे

शुनिचैव श्‍वापाके च पंडित: समदर्शिन:। (गीता)

मेरा नाम 'टाइगर' है, गो शक्‍ल-सूरत और रंग-रूप में मेरा किसी भी शेर या 'सिंह' से कोई साम्‍य नहीं। मैं दानवीर लाला अमुक-अमुक का प्रिय सेवक हूँ; यद्यपि वे मुझे प्रेम से कभी-कभी थपथपाते हुए अपना मित्र और प्रियतम भी कह देते हैं। वैसे मैं किस लायक हूँ? मतलब यह है कि लालाजी का मुझ पर पुत्रवत प्रेम है। नीचे मैं अपने एक दिन के कार्यक्रम का ब्‍यौरा आपके मनोरंजनार्थ उपस्थित करता हूँ -

6 बजे सवेरे - घर की महरी बहुत बदमाश हो गई है। मेरी पूँछ पर पैर रख कर चली गई। अंधी हो गई क्‍या? और ऊपर से कहती है - अँधेरा था। किसी दिन काट खाऊँगा। गुर्र-गुर्र... अच्‍छा-चंगा हड्डीदार सपना देख रहा था और यह महरी आ गई - इसने मेरे सपने के स्‍वर्ण-संसार पर पानी फेर दिया। विचार-श्रृंखला टूट गई। बात यह है कि मैं एक शाकाहारी घर में पल रहा हूँ। अत: कभी-कभी मांसाहार का सपना आ जाना पाप नहीं! यह मेरी अतृप्‍त वासना है, ऐसा परसों मालिक से मिलने को आए एक बड़े मनोवैज्ञानिकजी कह रहे थे।... फिर सो गया।

शनिवार, 18 जनवरी 2020

यदि मैं समालोचक होता - अमृतलाल नागर

संपादक जी,

इस सड़ी गर्मी में अपना तो क्‍या अमरीका और ब्रिटेन जैसे बड़े बड़ों का तेल निकल गया, महाराज। बरसात न होने के कारण हमारे अन्‍नमय कोष में महँगाई और चोरबाजारी के पत्‍थर पड़ रहे हैं, हम बड़े चिंताग्रस्‍त और दुखी हैं; पर यदि अपनी उदारता को पसारा देकर सोचें तो हम क्‍या और हमारा दुख भी क्‍या, क्‍या पिद्दी, क्‍या पिद्दी का शोरबा। अस्‍ली संकटग्रस्‍त और दुखी तो अंग्रेज अमरीकी कूटनीतिज्ञ राजनैतिक बेचारे महाजनगण हैं कि जिनकी आशाओं की बरसात नहीं हुई और जिनके प्राणमय कोश में इस समय केवल बगदाद पैक्‍ट की चिंदियाँ ही फरफरा रही हैं। हाय, ये क्‍या से क्‍या हो गया संपादक जी। अपि नियति नटी, अरी निष्‍ठुरे, तू बड़ी कठोर, बदमस्‍त और अल्‍हड़ है। न राजा भोज को पहचाने, न गँगुआ तेली को; अपनी मस्‍ती में समभाव से और बिना अवसर देखे ही तू जिस-तिस के मिजाज की मूँछें उखाड़ लेती है या सीधे किसी की छाती पर ही वज्र-प्रहार करती है। हमें गुसाई जी पर भी इस समय क्रोध आ रहा है जो ''हानि-लाभ जीवन-मरण यश-अपयश विधि हाथ'' सौंप गए। इन संतों को भावावेश में चट से शाप या वरदान दे डालने की अवैज्ञानिक आदत होती थी, इनके ज्ञानमय कोश में इतनी भी सामाजिक-राजनैतिक चेतना और दूरदर्शिता न थी कि तेल देखते, तेल की धार देखते। इसके अलावा अपने पुराने कवियों को भी हम क्‍या कहें, न जाने क्‍या देखकर नियति को नटी कह गए। यह नटी होती तो भला मौका चूकती! यह अवसर तो भवों, आँखों, होठों और गर्दन पर शोखी और भोलेपन के दोहरे डोरे डाल, नैन नचा, ठोकर मार, फिर चट से आँखों में घोर विस्‍मय का भाव ला ठोड़ी पर ऊँगली रखकर कहने का था : ''उई अल्‍लाह ये क्‍या हो गया?'' फिर दोनों की चोटें सहलाती हुई नियति नटी आँखों में आँसू भर चेहरे पर मासूमियत का भाव लाकर कहती : ''माफ करना डैडी, माफ करना अंकल, मैं तो नाच रही थी। हाय ये मुझसे क्‍या भूल हो गई!'' फिर टपाटप आँसू टपकाने लगती। नियति रानी को वर्ष का सर्वश्रेष्‍ठ अभिनय-पुरस्‍कार मिलता, हम दुखियारे भारतीयों को भाग्‍य से वर्षा मिलती : अनाज के भाव गिरते। फसल अच्‍छी न होने से हमारा करेला यों ही क्‍या कम कड़वा था कि ऊपर से महायुद्ध की नीम भी चढ़ने लगी। जाने कैसे और क्‍यों कर जी रहे हैं हम, ऊपर से ये लड़ाई की धमकी हो गई।

गुरुवार, 16 जनवरी 2020

बुद्धिजीवियों का दायित्व - शरद जोशी

लोमड़ी पेड़ के नीचे पहुँची। उसने देखा ऊपर की डाल पर एक कौवा बैठा है, जिसने मुँह में रोटी दाब रखी है। लोमड़ी ने सोचा कि अगर कौवा गलती से मुँह खोल दे तो रोटी नीचे गिर जाएगी। नीचे गिर जाए तो मैं खा लूँ।

लोमड़ी ने कौवे से कहा, ‘भैया कौवे! तुम तो मुक्त प्राणी हो, तुम्हारी बुद्धि, वाणी और तर्क का लोहा सभी मानते हैं। मार्क्सवाद पर तुम्हारी पकड़ भी गहरी है। वर्तमान परिस्थितियों में एक बुद्धिजीवी के दायित्व पर तुम्हारे विचार जानकर मुझे बहुत प्रसन्नता होगी। यों भी तुम ऊँचाई पर बैठे हो, भाषण देकर हमें मार्गदर्शन देना तुम्हें शोभा देगा। बोलो... मुँह खोलो कौवे!’

मंगलवार, 14 जनवरी 2020

सिकंदर हार गया - अमृतलाल नागर

अमृतलाल नागरअपने जमाने से जीवनलाल का अनोखा संबंध था। जमाना उनका दोस्‍त और दुश्‍मन एक साथ था। उनका बड़े से बड़ा निंदक एक जगह पर उनकी प्रशंसा करने के लिए बाध्‍य था और दूसरी ओर उन पर अपनी जान निसार करनेवाला उनका बड़े से बड़ा प्रशंसक किसी ने किसी बात के लिए उनकी निंदा करने से बाज नहीं आता था, भले ही ऐसा करने में उसे दुख ही क्‍यों न हो। परिचित हो या अपरिचित, चाहे जीवनलाल का शत्रु ही क्‍यों न हो, अगर मुसीबत में है तो वह बेकहे-बुलाए आधी रात को भी तन-मन-धन से उसकी सहायता करने के लिए तैयार हो जाते थे। उस समय वे अपने नफे-नुकसान की तनि‍क भी परवाह न करते थे। लेकिन व्‍यवहार में बड़ी ओछी तबीयत के थे, अपने टके के लाभ के लिए किसी की हजारों की हानि करा देने में उन्‍हें तनिक भी हानि न होती थी। वह स्‍त्री के संबंध में भी बड़े मनमाने थे। इज्जत-आबरूदार लोग उनसे अपने घर की स्त्रियों का परिचय कराने में हिचकते थे और ऐसा करने पर भी वे प्रायः जीवनलाल से जीत नहीं पाते थे। शहर के कई प्रतिष्ठित धनीमानियों की घेरलू अथवा व्‍यावसायिक अथवा दोनों तरह की आबरूओं को उन्‍होंने अपने खूबसूरत शिकंजे में जकड़ रखा था, वह भी इस तरह कि 'हम मासूम हैं। तुम्‍हारे गुनाह में फँसाए गए हैं, खुद गुनहगार नहीं।'

शनिवार, 11 जनवरी 2020

काजू भुने प्लेट में ह्विस्की गिलास में - अदम गोंडवी

काजू भुने प्लेट में विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में।

पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत
इतना असर है खादी के उजले लिबास में।

आजादी का वो जश्न मनाएँ तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में।

गुरुवार, 9 जनवरी 2020

घोडरोज - सदानन्द साही

ये घोडरोज हैं।

कभी हिरन का भ्रम पैदा करते हैं
कभी घोड़े का
कभी गाय का
इसीलिए इन्हें नीलगाय कहा जाता है।

जब लोग इनकी भोली सूरत पर रीझ कर
गऊ समझ बैठते हैं
तभी ये घुस जाते हैं खेतों में
चट कर जाते हैं पूरी की पूरी फसल
तबाह कर देते हैं
मानव श्रम और प्रतिभा की उपज।

सोमवार, 6 जनवरी 2020

पहल - रामरक्षा मिश्र विमल

एक दिन नदी ने अरार को उलाहना दी 
तुमने कभी जाना ही नहीं 
मेरे भीतर के रस को
सदा से कटे रहे हो मुझसे 
सूखे और तने रहकर 
आदर्श पुरुष बनना चाहते हो।

शनिवार, 4 जनवरी 2020

आपकी हँसी - रघुवीर सहाय

निर्धन जनता का शोषण है 
कह कर आप हँसे। 
लोकतंत्र का अंतिम क्षण है 
कह कर आप हँसे। 
सबके सब हैं भ्रष्टाचारी 
कह कर आप हँसे। 
चारों ओर बड़ी लाचारी 
कह कर आप हँसे। 

बुधवार, 1 जनवरी 2020

हार की जीत - सुदर्शन

सर्वश्रेष्ठ कालजयी हिन्दी कहानी Best Hindi Storyमाँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवद् - भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोड़ा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान। उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में न था। बाबा भारती उसे "सुल्तान" कह कर पुकारते, अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना खिलाते और देख-देखकर प्रसन्न होते थे। उन्होंने रुपया, माल, असबाब, जमीन आदि अपना सब-कुछ छोड़ दिया था, यहाँ तक कि उन्हें नगर के जीवन से भी घृणा थी। अब गाँव से बाहर एक छोटे - से मन्दिर में रहते और भगवान का भजन करते थे। "मैं सुलतान के बिना नहीं रह सकूँगा," उन्हें ऐसी भ्रान्ति सी हो गई थी। वे उसकी चाल पर लट्टू थे। कहते, "ऐसे चलता है जैसे मोर घटा को देखकर नाच रहा हो।" जब तक संध्या समय सुलतान पर चढ़कर आठ - दस मील का चक्कर न लगा लेते, उन्हें चैन न आता।

खड़गसिंह उस इलाके का प्रसिद्ध डाकू था। लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे। होते - होते सुल्तान की कीर्ति उसके कानों तक भी पहुँची। उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा। वह एक दिन दोपहर के समय बाबा भारती के पास पहुँचा और नमस्कार करके बैठ गया। बाबा भारती ने पूछा, "खडगसिंह, क्या हाल है?"