शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

मैं और तू - अहमद फ़राज़

रोज़ जब धूप पहाड़ों से उतरने लगती
कोई घटता हुआ बढ़ता हुआ बेकल साया
एक दीवार से कहता कि मेरे साथ चलो।

और ज़ंजीरे-रफ़ाक़त से गुरेज़ाँ दीवार
अपने पिंदार के नश्शे में सदा ऐस्तादा
ख़्वाहिशे-हमदमे-देरीना प’ हँस देती थी।

गुरुवार, 5 सितंबर 2019

माँ है रेशम के कारख़ाने में - अली सरदार जाफ़री

माँ है रेशम के कारख़ाने में
बाप मसरूफ़ सूती मिल में है
कोख से माँ की जब से निकला है
बच्चा खोली के काले दिल में है।

जब यहाँ से निकल के जाएगा
कारख़ानों के काम आएगा
अपने मजबूर पेट की ख़ातिर
भूक सरमाये की बढ़ाएगा।

बुधवार, 4 सितंबर 2019

याद - अमृता प्रीतम

आज सूरज ने कुछ घबरा कर
रोशनी की एक खिड़की खोली
बादल की एक खिड़की बंद की
और अंधेरे की सीढियां उतर गया…

आसमान की भवों पर
जाने क्यों पसीना आ गया
सितारों के बटन खोल कर
उसने चांद का कुर्ता उतार दिया…

सोमवार, 2 सितंबर 2019

370 का रीचार्ज - राजीव उपाध्याय

टीवी खोला ही था कि धमाका हुआ और धमाका देखकर मेरे बालमन का मयूर नाच उठा। बालमन का मयूर था तो नौसिखिया नर्तक होना तो लाजमी ही था। परन्तु नौसिखिए नर्तक के साथ सबसे बड़ी समस्या ये होती है कि उसे हर काम में ‘साथी हाथ बढ़ाना’ वाले भाव में एक साथी की आवश्यकता महसूस होती है। उसको नाचने में मजा तब आता है जब कोई साथ देने वाला हो। और मेरे पास पिता-मेड पत्नी के होने का घोर सुख प्राप्त था तो मैंने खुश होकर श्रीमती जी को आवाज लगाई, 

“एक बात जानती हो?”

उनके कान पीपल के पत्ते की तरह फड़फड़ा उठे और शोएब अख्तर के गेंद की तरह उनकी आवाज आई, “क्या?” 

मुझे लगा आउट हो जाऊँगा परन्तु फुल लेन्थ कि बॉल थी सम्भाल लिया। वैसे भी विवाहित पुरूष एक खिलाड़ी से कम नहीं होता है। खैर। मैंने कहा, 

रविवार, 1 सितंबर 2019

मैंने आहुति बन कर देखा - अज्ञेय

मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने, 
मैं कब कहता हूँ जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने? 
काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है, 
मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने? 

मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले? 
मैं कब कहता हूँ प्यार करूँ तो मुझे प्राप्ति की ओट मिले? 
मैं कब कहता हूँ विजय करूँ मेरा ऊँचा प्रासाद बने? 
या पात्र जगत की श्रद्धा की मेरी धुंधली-सी याद बने?

शनिवार, 31 अगस्त 2019

मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको - अदम गोंडवी

आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी एक कुएँ में डूब कर

है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी

चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा

शुक्रवार, 30 अगस्त 2019

माँ पर नहीं लिख सकता कविता - चन्द्रकान्त देवताले

माँ के लिए सम्भव नहीं होगी मुझसे कविता
अमर चिऊँटियों का एक दस्ता मेरे मस्तिष्क में रेंगता रहता है
माँ वहाँ हर रोज़ चुटकी-दो-चुटकी आटा डाल देती है
मैं जब भी सोचना शुरू करता हूँ 
यह किस तरह होता होगा 
घट्टी पीसने की आवाज़ मुझे घेरने लगती है
और मैं बैठे-बैठे दूसरी दुनिया में ऊँघने लगता हूँ
जब कोई भी माँ छिलके उतार कर
चने, मूँगफली या मटर के दाने नन्हीं हथेलियों पर रख देती है

गुरुवार, 29 अगस्त 2019

मानी - गुलज़ार

चौक से चलकर, मंडी से, बाज़ार से होकर
लाल गली से गुज़री है कागज़ की कश्ती
बारिश के लावारिस पानी पर बैठी बेचारी कश्ती
शहर की आवारा गलियों से सहमी-सहमी पूछ रही हैं 
हर कश्ती का साहिल होता है तो
मेरा भी क्या साहिल होगा?

बुधवार, 28 अगस्त 2019

हिन्दी-भोजपुरी विवाद: दम्भ जनित हीनता - राजीव उपाध्याय

हिन्दी-भोजपुरी विवाद Hindi Bhojpuriपिछले कुछ समय से हिन्दी के उपभाषाएँ एवं बोलोयाँ कही जाने वाली भोजपुरी, राजस्थानी व अन्य लोकभाषाएँ अपने स्वतंत्र अस्तित्व व अधिकारों के लिए कागज से लेकर सड़क और सड़क से लेकर संसद तक संघर्ष कर रही हैं। जिसका असर ये हुआ है कि हिन्दी के समर्थन में भी ध्रूवीकरण प्रारम्भ हो गया। हिन्दी के समर्थक इन माँगों को हिन्दी को कमजोर करने वाली व राष्ट्र की अस्मिता के लिए खतरा तक बता रहे हैं तो वहीं भोजपुरी व अन्य लोकभाषाओं के समर्थक हिन्दी को सामन्तवादी रुझान वाली भाषा बताते थक नहीं रहे हैं। यदि हम इन दो खेमों के माँगों एवं तर्कों पर ध्यान दें तो कम से कम इतना तो साफ हो ही जाता है कि दोनों तरफ कुछ ऐसे तर्क दिए जा रहे हैं जो कतई ही स्वीकार्य नहीं किए जा सकते। हिन्दी पर सामन्तवादी होने का आरोप हो या फिर भोजपुरी व अन्य लोकभाषाओं के स्वतंत्र अस्तित्व से राष्ट्रीय अस्मिता पर आँच का आरोप सर्वदा ही प्रलाप हैं जो बिना सोचे समझे अपनी माँगों को मजबूती प्रदान के लिए दिया जा रहा है।

मंगलवार, 27 अगस्त 2019

सूना घर - दुष्यंत कुमार

सूने घर में किस तरह सहेजूँ मन को।
पहले तो लगा कि अब आईं तुम, आकर
अब हँसी की लहरें काँपी दीवारों पर
खिड़कियाँ खुलीं अब लिये किसी आनन को।

पर कोई आया गया न कोई बोला
खुद मैंने ही घर का दरवाजा खोला
आदतवश आवाजें दीं सूनेपन को।