बुधवार, 14 दिसंबर 2011

कुछ तो कहो क्यों चुप रहते हो - 2

पहले पहल
जब तूम हंसते थे
दिल हंसता था
ज़ाँ आती थी;
तेरे संग
आँख मिचौली करते थे;
तूमसे छिपते थे
तूमसे ही मिलते थे।



तेरी आँखों की लय पर
जीवन डोर टिकाई है।
ग़म जो भी हों
कह दो
दे दो मुझको
चुप्पी तेरी
जाँ पर बन आयी है।
कह दो
जो भी हो दिल में तेरे
दिल थाम हाथों में
सांस रोके खड़े हैं।
जिंदगी
ये अब जिंदगी नहीं
जबसे उदास हो चले हो।
कुछ तो कहो
क्यों चुप रहते हो?
©राजीव उपाध्याय

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें