मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

कुछ मुक्तक -3

शाम से ही मनहुसियत छाई है, जाने कब से शमा ललचाई है।
दिल में मौत का ख़ौफ़, उजाले में अंधेरा ले के आई है॥



बस एक अदद मौत मांगी थी हमने, देकर खुद जिन्दगी का हवाला।
जिन्दगी ना मिली, मौत भी ले गया, जाने दिया कौन सा निवाला॥

परवाह ना कीजिए हुज़ूर आप, चीजें खुद बदल जाएंगी
जिन्दगी सफ़र अन्जाना, राहें मंजिल मिल जाएंगी॥
©राजीव उपाध्याय

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना शनिवार 11 अक्टूबर 2014 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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