सोमवार, 2 जनवरी 2012

हवा के इक झोंके ने

हवा के इक झोंके ने रुख--जिंदगी बदल दी
जाने कहाँ से कहाँ की तय मंजिल बदल दी।



महबूब ने मेरे जाने कौन सी ली बात दिल पर
कि उस बात ने मेरी हर बात बदल दी।

कोई तक़रार हुई होती तो कुछ समझ आता
अन्जान किसी लम्हें ने सारी कायनात बदल दी

हम दिल को बता समझाएं बहलाएं कैसे
जब तूमने मेरी दिन--रात बदल दी।
©राजीव उपाध्याय

2 टिप्‍पणियां:

  1. आधुनिकता का कौरा सच
    ऊम्दा रचना

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    1. जी भास्कर जी प्रयास तो किया है पर कितना सफल है आप जैसे गुणी लोग ही बता सकते हैं।

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