सोमवार, 13 अक्तूबर 2014

कुछ मुक्तक - 7

कहकहे भी कमाल करते हैँ
आँसुओं से सवाल करते हैं।
ज़ब रोते हैं तन्हा हम
हँसा-हँसा कर बुरा हाल करते हैं।
कहकहे भी कमाल करते हैँ


रूक रूक कर चलना, इक अदा बन गई।
कहते थे मय जिसको, वही सजा बन गई॥
नींद आती है हर रोज, जाने ही कितने बार।
पर आँखों को आजकल फ़ुर्सत कहाँ है॥

19 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब ... इस अदा के ही तो मारे हैं सब ...

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. प्रोत्साहन के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद दिगंबर जी।

      हटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बृहस्पतिवार (16-10-2014) को "जब दीप झिलमिलाते हैं" (चर्चा मंच 1768) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. स्थान देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद शास्त्री जी।

      हटाएं
  3. बुरा / फुर्सत सही कर लें टंकण की गलतियाँ हैं ।

    बहुत सुंदर :)

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. धन्यवाद जोशी जी। आपके द्वारा बताए गलतियों में सुधार कर दिया हूँ।

      हटाएं
  4. उत्तर
    1. प्रोत्साहन के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद पाण्डेय जी।

      हटाएं
  5. कहकहे भी कमाल करते हैँ
    आँसुओं से सवाल करते हैं।
    ...बहुत खूब!

    उत्तर देंहटाएं
  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं