सोमवार, 20 अक्तूबर 2014

हवा हूँ मैं या झोका कोई

हवा हूँ मैं या झोका कोई
चल रहीं हैं या ठहर गयीं

ये अंज़ान सांसें हैं रोज़ पुछ्तीं
ज़बाव कोई आजकल मिलता नहीं

ज़ज्बात अब बेअसर फ़िरते हैं
मुम्क़िन नहीं दिल बहलाना कहीं

आईने से भी चेहरा चुराता हूं
नज़रों से मेरी नज़रें न मिल जाएं कहीं।

इबादत मेरी आजकल
बहक बहक जाती हैं कहीं
ढुंढता हूं जब कमरे में बेतरह
सिलवटें कोई नज़र आती नहीं।
© राजीव उपाध्याय

14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर
    आपका ब्लॉग यहाँ पर भी हैँ।http://safaraapka.blogspot.in/
    मेरा ब्लॉग

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  2. टंकण में मात्राऐं गड़बड़ा रही हैं ध्यान रखें ।
    सुंदर भाव !

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    1. जी सहमत हूँ। तकनीकी समस्या है शायद। ध्यान दिलाने के लिए साधुवाद।प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभार।

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  3. अच्छी रचना।

    दीपावली की अशेष शुभकामनाएं !

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  4. अनुपम प्रस्तुति....आपको और समस्त ब्लॉगर मित्रों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं...
    नयी पोस्ट@बड़ी मुश्किल है बोलो क्या बताएं

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    1. बहुत धन्यवाद्। आपको भी हार्दिक शुभकामना।

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  5. ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति… मंगलकामनाएँ...

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  6. सहज व सरल अभिव्यक्ति.......
    http://savanxxx.blogspot.in

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