शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

जीने की लत

जीने की लत
जो हमने है पाली
जीने की लत……….

जीता हूँ दिल पर
बोझ लिए अब
रात अंधेरी
है काटे हरदम।
जब बोझिल
कुछ कदम बढाऊँ
राह मुझे छोड़े जाती है॥
जीने की लत……….

इक पल
मुझको चैन मिले जो
नज़र कुछ आती हैं।
कुछ चुप रहतीं हैं
कुछ कहतीं
फ़िर हाथ पकड़कर
जाने कहाँ


जीने की लत……….

22 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 6/10/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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  2. बहुत-बहुत धन्यवाद कुलदीप जी।

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (05-10-2014) को "प्रतिबिंब रूठता है” : चर्चा मंच:1757 पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. जीना सिर्फ अपने लिए ही नहीं , अपनों के लिए भी जीना पड़ता है ..
    बहुत बढ़िया ...

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    1. जी सहमत हूँ कि इन्सान को अपने लिए ही नहीं बल्कि अपनों के लिए जीना पड़ता है। या फिर कहें तो बहुत हद इन्सान अपनों के लिए ही जीता है।

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  5. बहुत सुन्दर और सटीक रचना...

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  6. बहुत सुंदर मन को छूने वाली -----------
    धन्यबद,

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    1. प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद सूबेदार जी

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  7. बहुत सुन्‍दर भावों को शब्‍दों में समेट कर रोचक शैली में प्रस्‍तुत करने का आपका ये अंदाज बहुत अच्‍छा लगा,

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद संजय जी। प्रयास किया है और पसन्द आया तो मेरे लिए हर्ष की बात है

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  8. जीने की लत कई मुकाम पाने की कोशिश जिन्दा रखती है ...

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    1. जी सच कहा आपने कि ये जीने की लत ही आपको नई नई दुनिया और मंजिलें दिखाती है।

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