शनिवार, 28 मार्च 2015

एक टुकड़ा याद - हेमन्त शर्मा 'कागज'

कविता जो बहुत ही अच्छी लगी आपकी नज़र। शब्दों में ढाल है श्री हेमन्त शर्मा 'कागज' जी ने। उम्र तो उनकी बहुत ही कम है पर बात वो कह गये हैं जो बालों में चाँदी आने के बाद भी अक्सर लोग नहीं कह पाते हैं। आपकी राय क्या है?
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हर सुबह
मेरी यादों की टोकरी से
निकलकर,
इक टुकड़ा
मेरी उंगली पकड़ लेता है;
और मैं
पूरा दिन उसे
अपने साथ
लिये घुमाता हुँ...

शायद उस वक्त की तलाश में
कि जब इस टुकड़े को
मैंने जीया होगा...

लेकिन हर शाम
सूरज के इस पेड़ से,
किरणों के सूखे पत्तों की तरह
यह टुकड़ा भी,
मुझसे अलग हो जाता है...

और हमेशा की तरह
वक्त के
उलझे धागे,
मेरे कमरे में
बिखरे रह जाते हैं...
-----------हेमन्त शर्मा 'कागज़'

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