शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

ख़ुद अपना लिखा मिटा रहे हैं

कागजों से अब रिश्ता खत्म सा होता जा रहा पर कभी-कभी उन कागजों की ओर लौटकर जाना ही पड़ता है। कुछ जरूरी कागजों को पलटते-पलटते ये 12 साल पुराना गज़लनुमा छंद सामने आ टपका। थोड़ा हैरान भी हुआ तो खुश भी कि चलो इन सालों यूँ ही नहीं गंवाया है। खैर। आपकी नज़र कुछ पुरानी चीज।
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हुआ है कुछ यूँ कि, अब ख़ुद अपना लिखा मिटा रहे हैं
छिपकर छिपकर रोते थे, अब आँसू ख़ुद से छिपा रहे हैं।
हवाएं जो कुछ कहती थीं, दिशाएं जो कभी बहती थीं
यूँ अंजानी अनसुनी हुई हैं, कि चेहरा उनसे छिपा रहे हैं।
सड़कें जो कभी संग चलती थीं, ख़त्म हुई हैं, ठहर गई हैं
जाने क्यों कर रूठ गयी हैं, कि हाथ अब उनसे छुड़ा रहे हैं। 

2 टिप्‍पणियां:

  1. प्रिय राजीव जी ,
    सबसे पहली बात ये की कुछ चीज़ें कभी पुराणी नहीं होतीं और यदि होती हैं तो उनका नशा कई गुना बढ़ जाता है .....और हाँ रफ़्तार तेज़ मंथर या तीव्र हो सकती है ...मगर कागजों और लेखनी से रिश्ता बनाए रखियेगा ...शुक्रिया

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    1. धन्यवाद अजय जी। कोशिश करुंगा कि ये रिश्ता सदा बना रहे।

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