बुधवार, 15 जुलाई 2015

अगर तुम खो गए - नवीन कुमार 'नीरज'

नवीन कुमार 'नीरज' की यह कविता 'अगर तुम खो गए ' एक कलाकार, एक कवि के उस डर को सामने लाता है जो दिखता नहीं है पर हर समय उसके साथ साये की तरह चलता रहता है और कवि उससे डर से परिचित भी है। ये डर उसको हार से डराता है। ये डर उसको आँधी में उड़ा देगा ऐसा कुछ कहता है। उसे लगता है कि उसका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा और जो है वो कहीं बह जाएगा; खत्म हो जाएगा। ये बात बस यहीं आकर रुकती नहीं है बल्कि आगे जाना चाहती है और यही बात शायद कवि को डरा रही है। इसलिए वह चेताता चलता है उस डर से जो शायद उसके अन्दर है; उसी में है या फिर कहें खुद से है।

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अगर तुम खो गए
दरिया मे तिनके की तरह हो गए…
मत पूछो क्या हाल होगा तुम्हारा
आँधी में उड़ते सूखे पत्ते की तरह हो जाओगे
बिना ज़िंदगी जिए ही मुरझा जाओगे
चाहे जितना जतन करोगे
खुद को नहीं ढूँढ़ पाओगे
बाढ़ का पानी की तरह बह जाओगे
तुम बसे घर को डूबा दोगे
खुशहाल ज़िंदगी को बहा दोगे
कुछ हाथ नहीं आएगा तुम्हारे
रेत को मुठ्ठी में बंद करते रह जाओगे


रात होने वाली है
तुम इस तरह सो मत जाना
सपनों में इस तरह खो मत जाना
कि दिन में बिना साकी के जाम छलकाते चलो
अपना साया को भूत समझ कर डरो

यही हाल रहा तुम्हारा तो
रात आँखों में कटेगी
दिन में तारे नज़र आएंगे
तुम सच्चाई से घबराओगे
अपने मन में, भूतों का शहर बसाओगे
तुम रोओगे, तुम चिल्लाओगे
पर अपनों से आँख नहीं मिला पाओगे
झूठे अफसाने से मन का बगिया बसाओगे
और अपनी तकदीर से आँख चुराओगे
……और एक दिन तुम हार जाओगे!
---------------नवीन कुमार 'नीरज'

10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 16 - 07 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2038 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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    1. चर्चा में शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

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  2. नवीन कुमार 'नीरज जी की कविता से परिचय कराने के लिए ..........आभार
    नवीन कुमार 'नीरज

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