सोमवार, 10 अगस्त 2015

आज जो ये आज है


हर नियम परिवर्तनीय है। कुछ भी स्थिर नहीं होता; चलयमान है। चलते रहना ही शायद एक मात्र सत्य है। चीजें, नाम और भेष बदलकर बार-बार सामने आती हैं। जो आज का सत्य है वही कल का असत्य बन जाता है। जो हकीकत है वही फसाना कहलाता है और जिसे गल्प कह करके अक्सर नकारते रहते हैं वही कल का सत्य होता है। कि अचानक एक ऐसा मोड़ आता है जहाँ सत्य और गल्प के बीच की दूरी खत्म हो जाती है और एक ऐसी नयी दुनिया कायम हो जाती है हमारे जेहन में कि हम उसके हर रंग के कायल हो उठते हैं। यूँ लगता है कि वही एक मात्र सत्य है और शायद कुछ क्षण के लिए होता भी है लेकिन झूठ ही होता है जो हमें ताउम्र भ्रमित रखता है। कभी नाम से और तो कभी ओहदे बदलकर।
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आज, जो ये आज है
कल नहीं रह जाएगा।
बारिश के बादलों सा
कुछ बरसेगा
कुछ रह जाएगा॥

हर बात
हर हस्ती
हर बस्ती
ख़ाक में मिल जाएगी। 
फितरत आदमी की
कहाँ-कहाँ ले जाएगी।

भाषा, परिभाषा 
और नियमों का क्या? 
कुछ नहीं रह जाएगा
बाकी अगर रहा कहीं तो
मिथक बस कहलाएगा॥

ना तुम होगे, ना रहूंगा मैं
प्रेम अमर
बस रह जाएगा॥

ये आज जो आज है
कल अतीत बन जाएगा॥

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 11 अगस्त 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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