बुधवार, 5 अगस्त 2015

लम्हों से गुजरकर लफ्ज़ तक - रजनी मल्होत्रा (नैय्यर)


रजनी मल्होत्रा (नैय्यर) जी के कुछ लम्हें जो लफ्जों में ढलकर सामने से गुजर जाते हैं और कह जाते हैं कुछ ऐसी बातें तो ठहरकर सोचने को मजबूर कर देते हैं तो वहीं कभी मन के उस कोने को भी छूकर गुजर जाते हैं जहाँ हम अक्सर नहीं ही जाते हैं। जब वो कहती हैं 'बनाकर बूत मुझे छोड़कर बुतख़ाने में, आ गए वो रस्में निभाने ज़माने से।' तो यकीनन आदमी ठहर सोचने को मजबूर हो जाता है; खुद अपने बारे में और दूसरों के बारे में भी। ठीक कुछ ऐसी ही बातें जो दिल-ओ-दिमाग में हलचल पैदा कर देती हैं उनके और कई शे'र भी करते हैं।
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छोड़ दिया कर कुछ वक़्त पर भी
अच्छा नहीं हर बात पर ख़ुदा हो जाना।
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पथरायी आँखों की कफ़स को तोड़कर
एक-एक कर ख़्वाबों के परिंदे उड़ जाते हैं।
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बनाकर बूत मुझे छोड़कर बुतख़ाने में
आ गए वो रस्में निभाने ज़माने से।
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जहाँ तुम दफ़न कर आये मुझसे जुड़ी यादों को,
देख लो वो मेरी आज में शामिल होकर ज़िंदा हैं।
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जिस्म पर दावेदारी करते रहें वो
रूह पर तो बोली हमारी लगी है।
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तुम्हारी आँखों से निकलकर बेघर हुए ख़्वाब
मुझसे आकर "रजनी" पनाह मांगते हैं।
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रजनी मल्होत्रा (नैय्यर)
जन्म: ७ जून, कुमंदी ग्राम, पलामू, झारखण्ड
चार काव्य संग्रह: 'स्वप्न मरते नहीं ', 'ह्रदय तारों का स्पन्दन', 'पगडंडियाँ' व 'मृगतृष्णा'
विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित
अनेकों पुरस्कार
भाषा लेखन: हिंदी, पंजाबी, उर्दू.
लेखन: गीत, ग़ज़ल, कहानियां व कविताएँ.
शिक्षा: हिंदी व इतिहास में स्नातकोत्तर। हिंदी में पी.एच. डी. चल रही।
सम्प्रति: संगणक विज्ञान की शिक्षिका
वर्तमान पता: बोकारो (झारखण्ड)
मोबाइल नं: 9576693153, 9470190089

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (07.08.2015) को "बेटी है समाज की धरोहर"(चर्चा अंक-2060) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  2. राजीव जी आपके इस उत्कृष्ट प्रयास को साधुवाद

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  3. राजीव जी आपके इस उत्कृष्ट प्रयास को साधुवाद

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