रविवार, 11 अक्तूबर 2015

देवता के बच्चे - नवीन कुमार नीरज

मैं उस रास्ते पर चलते हुए बहुत दूर निकल गया था।
उस रास्ते पर चलते हुए जिसके दोनों ओर बहुत ऊँचे-ऊँचे पेड़ लगे थे।
ऐसा लगता था जैसे वे पेड़ आसमान को छू रहे थे।
उस समय मुझे ऐसा लगा जैसे, शायद यह सड़क किसी स्वर्ग तक जाती है।
और मैं उस सड़क पर चलने से अपने को रोक नहीं पाया,
मैं चलता गया, मैं चलता गया।
उस सड़क पर चलते-चलते जब मैं बहुत दूर निकल गया,
पता नहीं मैं कितना दूर निकल गया था ---
मैं एक मोड़ पर पहुँचा और उस मोड़ से मुझे एक नई सड़क दिखी।
न जाने क्यों मैं उस सड़क पर चल पड़ा।
उस सड़क पर चलते-चलते मुझे एक बाग़ दिख गया।
उस बाग़ में जाने से मैं अपने को रोक नहीं पाया।
मैंने अपने पूरे जीवन में ऐसे बाग़ पहले कभी नहीं देखे थे।
आप ऐसी चीज़ों की कल्पना नहीं कर सकते!
वह बाग़ कल्पनातीत था --- अति मनोरम!
जैसे मैं इंद्र के बाग़ में पहुंच गया था,
पर मुझे शक है कि इंद्र का बाग़ भी उतना सुंदर होगा!
मैं मंत्रमुग्ध-सा सब कुछ निहार रहा था।
पेड़-पौधे, फूल-पत्ते, कली और भँवरें --- सभी एकदम से निराले थे।
पर सबसे ज्यादा मैं आश्चर्यचकित था, बाग़ में टहलते बच्चो को देखकर!
क्या इतने प्यारे बच्चे होते हैं!
सच में, मैंने इतने प्यारे बच्चे पहले कभी नहीं देखे थे।
वे सारे बच्चे देवता के बच्चे थे।
बहुत ही प्यारे, बहुत ही सुंदर!
मुझे लगा जैसे सुंदरता का जन्म यही से होता है।
वे कैसे चलते थे, वे कैसे देखते थे!
वे कैसे हँसते थे, वे कैसे बातें करते थे!
आप देखो तो बस देखते रह जाओ!
आप जैसे उस सुंदरता के बीच खो जाते हैं।
आप जरा भी नहीं बचते, रत्ती भर भी नहीं।
आपको पता ही नहीं चलता कि कब आप खो गए।
और सबसे कमाल कि आपको इसकी परवाह भी नहीं होती।
खो जाना किसे कहते हैं, आप इसे पहली बार महसूस करते हैं।
सच में, आप पहली बार जानते हैं कि खो जाना क्या होता है।
हाँ, सच में, मैं खो गया था।

तभी अचानक मेरी नज़र उस बूढ़े व्यक्ति पर गई।
मुझे अफ़सोस है कि उस बूढ़े के बारे में ज्यादा नहीं कह सकता,
कारण कि, मैं अच्छे शब्द पहले ही खत्म कर चुका हूँ।
अब बाकी बचे शब्दों में उस बूढ़े का बयान कैसे संभव है!
उनका सौन्दर्य शब्दातीत था, उसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता।
मैं सच कहता हूँ, मेरी जगह आप भी होते तो आप भी वही महसूस करते ---
यही कि वह बूढ़ा परम सुंदर था।
मैं उन तक जाने से अपने को रोक नहीं पाया।
वे मुझे देखकर मंद-मंद मुसकराए,
जैसे कि वह मेरे मन की बात समझ रहे हों।
“तो तुम इन बच्चे को देख रहे थे?” उन्होंने मुझसे पूछा।
मैंने इसे स्वीकारा।
“तुम्हें ये बहुत प्यारे लगे, हैं न?” उन्होंने फिर से पूछा।
“हाँ ये बहुत प्यारे हैं?” मैंने कहा।
“बच्चे प्यारे होते ही हैं, कभी तुम भी बहुत प्यारे होगे।”
उनका कहना था और वे आगे कहते रहे, मैं सुनता रहा।
“बचपन बहुत प्यारा होता है, हम सबका बचपन बहुत प्यारा होता है।
“पर यह बहुत अधिक दिन टिकता नहीं, यह तुमसे खो ही जाता है।
“तुम इसे बचा भी नहीं सकते, जैसे तुम हवा को कैद नहीं कर सकते।
“पर मन में इसकी ललक लगी ही रहती है, तुम इसे कैद करना चाहते हो।
“जो खो गया है, उसे फिर से पा लेना चाहते हो।
“इसलिए तुम बच्चे चाहते हो और तुम बच्चे पैदा करते हो,
ताकि खोया बचपन फिर से मिल जाए और तुम्हारी अधूरी लालसा पूरी हो जाए।
“पर क्या ऐसा होता है? तुम्हारी लालसा पूरी होती है?
“तुम्हारा मन लालसाओं के बीच ऐसे फँसता है, जैसे जाल में चिड़िया।
“तुम जितना फड़फड़ाते हो, तुम उतना ही फँसते जाते हो।
“लोग कहते हैं कि बच्चे परमात्मा की संतान होते हैं, शायद यह सही भी हो।
“पर तुम बड़े होकर परमात्मा की संतान क्यों नहीं रह जाते?
“शायद परमात्मा तुमसे छल करता है और तुम आसानी से छल लिए जाते हो।
“तुम इन बच्चे को ग़ौर से देखो, ये मनुष्य के बच्चे नहीं है।
“ये देवता के बच्चे हैं, ये कभी बड़े नहीं होंगे, ये हमेशा बच्चे ही रहेंगे।
“देखो ये कितने प्यारे लगते हैं, इनका रूप बदलता नहीं फिर भी ये इतने प्यारे हैं।
“जबकि तुम हमेशा बदलते रहते हो।
“तुम इतनी तेज़ी से बदलते हो कि ऐसा लगता है, जैसे तुम्हें हर चीज़ की बहुत जल्दी है।
“जल्दी-जल्दी में तुम अपना बचपन भी जल्दी खो देते हो।
“तुम मनुष्य बहुत जल्दी करते हो।
“तुम इतनी जल्दी क्यों करते हो?
“तुम इतनी जल्दी करते हो कि हर चीज़ तुमसे जल्दी ही खो जाती है।
“इसलिए परमात्मा भी तुमसे जल्दी ही खो जाता है।
“जबकि इन देवताओं से तुम्हें अधिक वरदान मिला है,
तुम उनका सदुपयोग क्यों नहीं करते?
“तुम इन देवताओं के बच्चों से अधिक सुंदर हो सकते हो,
क्योंकि परमात्मा स्वयं तुम्हारे अंदर मौजूद है,
जो कि इन बच्चों के नसीब में नहीं है।
“तुम इन देवताओं जैसे बच्चे की कामना करते हो,
पर जान लो, यह मिल भी जाएंगे तो खो जाएंगे।
“क्योंकि परमात्मा जो तुम्हें देता है उसे तुम बचाकर रख नहीं पाओगे,
वह तुमसे खो ही जाएगा, यह स्वाभाविक है।
“तुम जान लो परमात्मा तुममे कामना जगाता है
और तुम उस कामना के अधीन हो जाते हो।
“तुम जो चाहते हो तुम्हें मिल भी गया तो तुम उसे खो दोगे।
“तुम जान लो, जो तुम मांगोगे, वह तुम्हें मिल भी गया तो तुमसे खो जाएगा;
यही सृष्टि का स्वभाव है।
“इसलिए मांगो मत, उपलब्ध करना सीखो। क्योंकि तब तुम्हें खोने का ग़म नहीं रह जाएगा।
“इससे तुम दुःख में नहीं पड़ोगे।
“तुम हर भ्रम से मुक्त होगे।”
इतना कहकर वे चुप हो गए।
उनके चेहरे पर वही मुसकान खेल रही थी, जिससे मैं वशीभूत हो गया था।
अनूठा था उनका मौन!
मैंने उन्हें बहुत गौर से देखा और मुझे कुछ आभास हुआ!
पर दूसरे ही क्षण वे मेरे सामने नहीं थे।
न ही वह बाग़ था, न ही वे देवता के बच्चे।
वह सड़क भी नहीं थी, न ही वे पेड़।
मैं कहाँ था, मुझे स्वयं पता नहीं।
यह सब कुछ क्या भ्रम था या फिर स्वप्न?
पर कहीं-न-कहीं यह मेरे अंदर घटित हुआ ही था।
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नवीन कुमार 'नीरज'

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