शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2015

हक़ीकत नहीं ये, ना ही फसाना है - राजीव उपाध्याय

हक़ीकत नहीं ये, ना ही फसाना है
बस ख्वाबों में मेरा, आना-जाना है॥

लोगों की बातें मैं सुनता नहीं
अपना कहा मैं करता नहीं
अब होने ये क्या लगा है
दिल ही नहीं ये, ना ही मयखाना है।
बस ख्वाबों में मेरा, आना-जाना है॥

जब आसमां से उतर, जमीं देखता हूँ
सड़क है ना पगडंडी, ना पग के निशां
ढूँढू तो ढूँढू, आशियां अपना कैसे
राह-ए-डगर को जो रूक जाना है।
हक़ीकत नहीं ये, ना ही फसाना है॥ 
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15 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (11-10-2015) को "पतंजलि तो खुश हो रहे होंगे" (चर्चा अंक-2126) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. उत्तर
    1. आपका प्रोत्साहन सदैव मिलता रहा है। धन्यवाद

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  3. दूरी अखरती है तो ख्वाब में बदलती है
    बहुत सुन्दर

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    1. जी यहीबात बहुत हद तक कहने की कोशिश रही है यह। धन्यवाद

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