गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

अजनबी है - राजीव उपाध्याय

रहता हूँ शहर में जिस
अजनबी है।
कभी कहीं
तो कभी कहीं है॥

हालात है ये
कि ना कोई जानने वाला
और ना ही
सड़कें पहचानती हैं।
रहता हूँ शहर में जिस
अजनबी है।

हर तरफ शोर ही शोर है
और चकाचौंध भी
पर मनहूस सी खामोशी कोई
भारी है सीने में;
जो जीने का सबब भी देती है
और मरने की वजह भी;
और यूँ कर के बेखौफ हूँ
फिर भी मगर
डर कहीं ना कहीं है।
रहता हूँ शहर में जिस
अजनबी है॥

जान-पहचान के लोग
और गलियाँ सारी
जो सुनते थे मुझको;
खामोश हो गए हैं
कि मुलाकात अब होती नहीं;
और गाहे-बाहे
जो पड़ते कभी सामने
तो फेरते हैं मुँह
जैसे कोई अजनबी।
रहता हूँ शहर में जिस
अजनबी है।

कुछ इस तरह से
दो छोरों के बीच
नदी बन बहता जा रहा हूँ
जिसमें कोई रवानगी नहीं;
बस हड़बड़ी है एक
कि छोर दोनों एक हो जाएं
या मैं खो जाऊं कहीं।
बस इतने में ही सिमटी
ये जिन्दगी है।
रहता हूँ शहर में जिस
अजनबी है॥
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