शुक्रवार, 7 जून 2019

प्रोफेसर - मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

आज फिर उनके सम्मान में हजरत रंजूर अकबराबादी एडीटर, प्रिंटर, पब्लिशर व प्रूफरीडर त्रैमासिक 'नया क्षितिज' ने एक शाम-भोज दिया था।

जिस दिन से प्रोफेसर काजी अब्दुल कुद्दूस, एम.ए., बी.टी. गोल्ड मैडलिस्ट (मिर्जा का कहना है कि यह पदक उन्हें मिडिल में बिना नागा उपस्थिति पर मिला था) यूनिवर्सिटी की नौकरी से त्यागपत्र देने के बाद बैंक ऑफ चाकसू लिमिटेड में डायरेक्टर, पब्लिक रिलेशन्स एंड एडवरटाइजिंग की हैसियत में धाँस दिए गए थे, उनके सम्मान में इस तरह के शाम-भोज, स्वागत-समारोह और डिनर दैनिक दफ्तरी जीवन का तत्व बल्कि जीवन का अंग बन गए थे। घर पर नेक कमाई की रोटी तो केवल बीमारी के समय में ही बरदाश्त करते थे, वरना दोनों समय स्वागत-भोज ही खाते थे। बैंक की नौकरी प्रोफेसरश्री के लिए एक अजीब अनुभव साबित हुई, जिसका मूल्य वो हर तरह से महीने की तीस तारीख को वसूल कर लेते थे।

क्षमा कीजिए, इस रेखाचित्र में हम उन्हें प्रोफेसर ही कहेंगे। मिर्जा के कथनानुसार, आदमी एक बार प्रोफेसर हो जाए तो उम्र भर प्रोफेसर ही कहलाता है, चाहे बाद में समझदारी की बातें ही क्यों न करने लगे, पठन-पाठन तो एक नैतिक बहाना था, वरना बकौल मौलाना मुहम्मद हुसैन आजाद - प्रोफेसर का 'पेशा संतोष था और और बुद्धिहीनता से उसका सौंदर्य-वर्धन करते थे।'

वह किसी के दबैल नहीं थे। दबंग और दिलेर आदमी थे और खतरे से डरना बचना तो दूर कभी-कभी तो साँप को रस्सी समझकर गुँथ मरते थे। उनका दुस्साहस अब बहादुरी से बढ़कर आत्मघाती और आत्मघाती से बढ़कर मूर्खता की अलौकिक सीमाओं में प्रवेश कर चुका था। कोई आदमी अगर उनसे बहस, नौकरी या ब्रिज में आगे निकल जाए तो उसके पूरे इलाके, पूरे सूबे से नफरत हो जाती थी। भारतीय प्रायद्वीप का शायद ही कोई प्रदेश बचा होगा जिससे उनकी निजी दुश्मनी न हो, बल्कि अब तो छोटी-छोटी तहसीलें आँखें दिखाने लगी थीं।

वॉयसचांसलर को भरी मीटिंग में 'शटअप' कहने के बाद वह तीन महीने का अवकाश लेकर घर बैठ गए और विरोध स्वरूप अखबार तक पढ़ना बंद कर दिया कि इसमें यदा-कदा वॉयसचांसलर की तस्वीर छप जाती थी। यूँ भी उन्होंने जिंदगी भर जुबान के अलावा किसी दूसरे अंग को कष्ट नहीं दिया था लेकिन अब चौबीस घंटे में एक बार बला की चुस्ती दिखाते थे। वो उस समय जब दिन भर आरामकुर्सी पर ऊँघते रहने के बाद वह शाम को आठ बजे सोने के लिए बड़ी फुर्ती से कूद कर पलंग पर चढ़ते थे। अपने व्यवसाय से तंग आ चुके थे और कहते थे कि तुम्हारा ध्यान आ जाता है वरना अक्सर जी में आता है कि घर को आग लगाकर किसी सुनसान द्वीप में एक लोटा, डोर, फूट साल्ट और दीवाने-ग़ालिब लेकर चला जाऊँ। (यह घर यूनिवर्सिटी का था और जिस फर्नीचर से सजा हुआ था उस का साल भर का किराया चढ़ा हुआ था।)

ऊब की इस हालत में एक दिन बोहेमियन कॉफी हाउस (इसमें मिर्जा रोज लौंढिहार मचाते थे) में नथनों की चिमनी से सिगरेट का धुआँ उगलने के बाद कुर्सी पर उकड़ू बैठ गए और मुट्ठी भींचकर कहने लगे :

'अगर मैं इस मुल्क का प्राइम मिनिस्टर होता तो...'

'तो', हमने पूछा।

'तो यूनिवर्सिटी में नौकरी नहीं करता।' उन्होंने मुट्ठी खोल दी।

वह प्राइम मिनिस्टर जुरूर होना चाहते थे मगर जिस मात्रा में मानसिक संतोष और फुरसत वह चाहते थे, वह हमारे यहाँ सिर्फ प्राइमरी स्कूल के टीचर को नसीब है। फुरसत और किताब का जहाँ इतना दखल हो तो आप स्वयं अनुमान लगा सकते हैं कि पठन-पाठन का व्यवसाय छुड़वाने में हमें कैसे-कैसे सुनहरे सपने दिखाने पड़े होंगे लेकिन इस पुनीत-कार्य में हमें अधिक झूठ नहीं बोलना पड़ा। इसलिए कि ज्ञान और साहित्य से जी खट्टा करने में यूनिवर्सिटी के विद्वानों ने ऐसी प्रभावकारी भूमिका निभाई कि प्रोफेसर का दिल अपने पेशे से ऊब गया। अवकाशकाल के दौरान सूचना मिली कि यूनिवर्सिटी ने उनके जूनियर को 1857 ई. में दिल्ली के सौदा बेचने वालों की आवाजों पर रिसर्च करने के लिए सात समंदर पार लंदन भेजा है। प्रोफेसर ने उसी समय हमारे बेटे की चार लाइन वाली कॉपी पर त्यागपत्र लिख कर बैरंग पोस्ट कर दिया और अपना अधूरा शोध-प्रबंध 'चाकसू (खुर्द) का दबिस्ताने-शायरी' (जिसका विषय उन शायरों का कलाम था जिनका जन्म कहीं और होने के बजाय चाकसू खुर्द में हो गया था) फाड़ कर फेंक दिया। इस शोध-प्रबंध के पंद्रह साल तक अधूरे रहने का कारण यह था कि कई ऐसे शायर जिन पर वह टिप्पणी करना चाहते थे उनके स्वर्गवास में अभी काफी देर मालूम होती थी।

तो यह उस काल का वर्णन है जब प्रोफेसर अपनी टूटी-फूटी नाव जला ही नहीं चुके थे बल्कि उस की राख से तन पर भभूत रमाये मूर्खों के मन की आँखें खोलते फिरते थे।

क्लासरूम से बैंक तक पहुँचने में प्रोफेसर को किस टेढ़े-मेढ़े मार्ग से गुजरना पड़ा यह उनका दिल जानता है या हम। इसका विवरण किसी अनुपयुक्त समय पर टाल देते हैं। बैंक में अफसरी से उनके कंधों का प्रोफेसराना झुकाव तो दूर नहीं हुआ लेकिन बहुत से सुखद परिवर्तन, कुछ स्वयं से, कुछ औरों के कहने सुनने से उनमें पैदा हो गए। अब तक उनका व्यक्तित्व self made (स्व-निर्मित) था, यानी उसमें उन्होंने दर्जी, धोबी, डॉक्टर और नाई को सुधारने का कोई मौका नहीं दिया था। प्रोफेसर के प्रारंभिक दिनों में जब लड़के बिल्कुल लड़कों ही की सी हरकत करने लगे तो हम सबने सलाह दी कि बोल-चाल में डपट और व्यक्तित्व में रोब-दाब पैदा करो। दूसरे ही दिन उन्होंने जूतों में पौन इंच मोटा तला लगवा लिया और ऊँची बाढ़ की टोपी पहननी शुरू कर दी जिससे लंबाई तो खैर क्या बढ़ती, अलबत्ता उनका अहम इतना ऊँचा हो गया कि हमने उन्हें बादशाही मस्जिद के दरवाजे से भी झुक कर निकलते देखा। राई अपनी आन की प्रबलता से पहाड़ बन चुकी थी। व्यक्तित्व भी उनका अपना नहीं रहा था। बाज का चलन अपना लिया था। यानी बार-बार अपने विषय और संबोधित पर - झपटना, पलटना, पलट कर झपटना (इकबाल की पंक्ति)

झूठ क्यों बोलें। हमने कभी बाज नहीं देखा। अल्लाह जाने उसकी मूँछें होती हैं या नहीं। बहरहाल उन्होंने रख ली थीं जो बराबर ताव देते-देते काग खोलने के स्क्रू (पेंच) जैसी हो गई थीं। दाईं मूँछ हमेशा सफेद रहती थी, इसलिए कि ब्लैक बोर्ड पर सफेद चाक से लिखते-लिखते, उसको चुटकी से बल देते रहते थे और यह आदत इतनी पक्की हो चुकी थी कि हालाँकि बैंक में नियुक्ति का परवाना मिलते ही मूँछ का सफाया करा दिया लेकिन बेचैन चुटकी से महीनों उसी जगह को ताव देते रहे, जहाँ कभी मूँछ हुआ करती थी। इन तब्दीलियों का यह असर हुआ कि लड़कों ने इनके लेक्चर की स्पष्ट गलतियों पर हँसना छोड़ दिया। अब उनके हुलिए पर ठहाके लगाते थे।

नियुक्ति के तीन महीने बाद बैंक ने प्रोफेसर को जन-संपर्क और प्रचार के प्रशिक्षण के लिए छह सप्ताह के कोर्स पर पेरिस भेजने के आदेश पारित किए और यह भी प्रस्ताव किया कि अगर आप अपनी बेगम को साथ ले जाएँ तो बड़ी प्रसन्नता होगी। दोनों के फर्स्टक्लास के टिकिट और होटल की बुकिंग बैंक के जिम्मे होगी। पत्र मिलते ही दिमाग में शहनाइयाँ बजने लगीं। कराची की उन तमाम महिलाओं की, जिनके सर्वाधिकार कहीं और सुरक्षित थे, एक मुकम्मल सूची हमसे बनवाई और फिर पसर गए कि फिलहाल इनमें से किसी एक से दो बोल पढ़वा दो ताकि टिकिट बेकार न जाए और हनीमून निःशुल्क पड़े। अगर मिर्जा ने एक ही वाक्य से उनकी बुद्धि की सारी गाँठें न खोल दीं होतीं तो खुदा जाने कब तक हमारी जान को आते रहते। फरमाया, बीवी को पेरिस ढोकर ले जाना ऐसा ही है जैसे कोई एवरेस्ट विजय को निकले और थरमस में घर से बर्फ की डली रखकर ले जाए।'

पेरिस, (जिसे अब वह प्यार में 'पेरी' कहते थे) से लौटने को लौट तो आए लेकिन दिमाग वहाँ के कॉफी-घरों और दिल वेश्या-घरों में छोड़ आए। अपनी माटी की काया मात्र को पाकिस्तान में घसीटे फिर रहे थे। सामने देनदारों के खाते खुले पड़े हैं मगर आँखों में वही किताबी चेहरे फिर रहे हैं - कि जिनको देखे यूरोप में तो दिल होता है सीपारा।

एक-एक से पूछते थे कि पाकिस्तान में फ्रांस की क्रांति कब आएगी? इस क्रांति के स्वागतार्थ वह अपनी पतलनू की 'क्रीज' उस्तरे की धार जैसी बनाए रखते थे। पुराने ढब की गरारे जैसी पतलूनों के पाँयचे उनकी बहन ने गावतकियों पर गिलाफ के तौर पर चढ़ा दिए थे और उनकी ऊँची बाढ़ की टोपी से एक खूबसूरत टी-कोजी बनाई जिसे उठाते ही उनका सर याद आता था। पहले अपने पूज्य पिता को भी पत्र लिखते तो अंत में सेवक प्रोफेसर काजी अब्दुल कुद्दूस, एम.ए., बी.टी., गोल्ड मैडलिस्ट लिखकर गोल्ड मैडलिस्ट को एहतियातन रेखांकित कर देते थे कि बंदा मनुष्य है, कहीं ऐसा न हो कि नजर चूक जाए लेकिन अब कागज पर कलेजा निकाल कर रख देने की जगह बैंकरों के स्टाइल में हस्ताक्षर की जगह एक जलेबी सी बना दिया करते थे, जिसकी नकल कम से कम कागज पर तो कोई भी हलवाई नहीं कर सकता। कालर में धोबी से खास तौर पर कलफ लगवाते। खुद भी अंग्रेजी उच्चारण में खूब कलफ लगाने लगे थे। दिलद्दर दूर होते ही समय की पाबंदी भी कष्ट उठाने की हद तक करने लगे थे। जब से अँधेरे में समय बताने वाली घड़ी खरीद कर लाए थे, उन्हें दिन से उलझन होने लगी थी। फर्श पर आसन जमाने के बचपन से आदी थे, उसे तो नहीं त्यागा लेकिन अब गावतकिए का सहारा लेकर नहीं बैठते थे, उसे गोद में लेकर बैठते थे। सारांश यह कि 'पर्सनैलिटी' निकल आई थी। बैलगाड़ी में जैट वायुयान का इंजन लग गया था।

त्रैमासिक 'नया क्षितिज' के संपादक जिन्होंने यह शाम की चाय की व्यवस्था की थी, शेर में अजीब-सी रुचि रखते हैं। शेर को गलत पढ़कर और गलत समझ कर भी इतना रस लेते हैं कि अच्छे-अच्छे सही समझने वाले भी बगलें झाँकते रह जाते हैं। दैनंदिन की बातचीत में खुद को 'इन शब्दों का लेखक कहते हैं।' जैसे ही हम टाट का पर्दा उठाकर 'नया क्षितिज' के दफ्तर में घुसे, संपादक महोदय ने हमारे सलाम के जवाब में दो तीन बार अपना हाथ बगुले की गर्दन की तरह मोड़-मोड़ कर हमें दिखाया, जिसे हमने अशिष्टता समझ कर नजर-अंदाज कर दिया मगर ज्यों ही हमारा सर छत से टकराया, हमारी समझ में आ गया कि रंजूर साहब ने जो हाथ बगुला बनाकर हमें चिढ़ाया था तो वह दरअस्ल सर घुटनों में देकर चलने का इशारा था, क्योंकि दफ्तर की छत मुश्किल से पाँच फिट ऊँची होगी। वह तो खुदा भला करे मिर्जा का, अगर वो हमारी गरदन में लटक कर हमें तुरंत दुहरा न कर देते तो हमारा सर ऊपर चलते हुए पंखे से कब का बड़ी सफाई से कट कर उनके कदमों में जा गिरा होता और हम तो क्या, हमारे बीमे की रकम तक निबट चुकी होती।

सर उतारने के अलावा पंखे का अन्य उपयोग किसी के कथनानुसार गर्म हवा को सारे कमरे में बराबर-बराबर के हिस्से में फैलाना था ताकि कोई हिस्सा वंचित न रह जाए। जैसे ही हम सर और तन के नाजुक रिश्ते की रक्षा करते हुए आगे बढ़े, संपादक, त्रैमासिक 'नया क्षितिज' ने बायाँ हाथ मिलाने के लिए प्रस्तुत किया। हमने भी शिष्टतावश अपना बायाँ निकाला तो चारों तरफ से खी-खी की आवाजें आने लगीं। हमने झेंप कर झट से वो हाथ दाईं जेब में ठूँसने की कोशिश की। फिर याद नहीं कौन सी जेब में से अपना दायाँ खींच कर निकाला और उसे उनके बाएँ से मिलवाने की कोशिश की। खी-खी-खी-खी की आवाजें और तेज हो गईं। तड़प कर उन्होंने अपना हाथ छुड़ाया और दोनों हाथों से हमारी दाईं कलाई मरोड़ कर हथेली को अपनी तरफ किया। फिर हमारी हथेली को अपनी हथेली से दो-तीन बार प्रेम से रगड़ा जिसे हम इन हालात में हाथ मिलाना कह दें तो झूठ न समझा जाए।

वस्तुतः भूल हमारी ही थी। इसलिए कि हर व्यक्ति जानता था कि रंजूर साहब दो साल से बाएँ हाथ से हाथ मिलाने लगे हैं, जिसका कारण यह था कि पिछले बारह साल से वह बाएँ हाथ में एक सूटकेस लटकाये फिरते थे जिसे दीनतावश वह ब्रीफकेस कहते थे। इसमें बारह साल की सारी करतूत, यानी सारे विशेषांक और बेगम के हाथ की बनाई हुई गिलौरियाँ बंद रहती थीं। दोनों में एक दूसरे की बू-बास इस तरह रच बस गई थी कि जब प्रचारकों को तवायफ विशेषांक खोल कर दिखाते तो महसूस होता कि पानदान खुल गया और कभी चाँदी के वरक में लिपटी, लखनवी किवाम और सस्ती खुश्बुओं के भभके मारती गिलौरी खिला देते तो लगता कि 'तवायफ की पाप-बीती' बल्कि खुद उसी को चबा रहे हैं। ब्रीफकेस उठाए फिरने से उनका बायाँ कंधा स्थायी रूप से झुक गया था और जब यह झोली हाथ में न हो तब भी उनका बायाँ हाथ घुटने को छूता था। जब उन्हें साहित्य-जगत में पीसा के झुके हुए मीनार के उपनाम से याद किया जाने लगा तो शुरू-शुरू में बहुत इतराते फिरे। फिर एक दिन मिर्जा ने अकेले में समझाया कि इशारा तुम्हारे राजनीतिक झुकाव की तरफ नहीं है तो चौंक पड़े। 'अच्छा! यह बात है।' कंधों की बारह साल पुरानी कान निकालने के लिए मिर्जा ने यह कसरत प्रस्तावित की कि आइंदा बारह साल तक दूसरे हाथ से उठाओ। चुनांचे उन्होंने 'ब्रीफकेस' दाएँ हाथ में स्थानांतरित कर दिया और बाएँ हाथ से हाथ मिलाने की आदत डाल ली। गिलौरी भी अब बाएँ के बजाय दाएँ कल्ले में रखने लगे थे। यह उसी काल का वर्णन है। कथित हाथ मिला चुके तो प्रोफेसर ने हमारा परिचय कराया कि आप से मिलिए। आप हमारे साथ पाँचवीं क्लास में दीनियात (धर्मशास्त्र) के परचे में नकल करके फेल हुए थे। इस समय दुछत्ती के नीचे दस-बारह आदमी बैठे होंगे। हालाँकि कुर्सियाँ दो ही नजर आ रही थीं। एक की टाँगें शराबी जैसी थीं। इस पर मेजबान यानी संपादक, 'नया क्षितिज' लड़खड़ा रहे थे। दूसरी की पीठ और पायों का घुना हुआ हिस्सा छह-छह इंच काट दिया गया था। इस पीढ़ी पर मुख्य अतिथि कुंडली मारे बैठे थे। उनकी ठोढ़ी मेज पर इस तरह धरी थी जैसे मेलों और कस्बों की नुमाइशों के जादूघर में मदारी के जमूरे का कटा हुआ सर रखा रहता है। सामने 'नया क्षितिज' की बिक्री के अयोग्य प्रतियों के बंडल दीवार के साथ बड़े करीने से चुने हुए थे। इन पर पत्रिका के सहयोगी लेखक बिठाये गए थे। यह नहीं कि आतिथेय को अपने प्यारे अतिथियों की असुविधा का ध्यान न था। हर आने वाले की आवभगत वह इस तरह करते कि झपाक से अपने नीचे से रूई की गद्दी निकाल कर उसे पेश कर देते और 'जी आप! नहीं आप! अरे साहब! क्यों काँटों में घसीटते हैं?' की शिष्ट बहस के बाद उसे वापस अपनी ही कुर्सी पर ढक देते क्योंकि उसमें एक छेद था, जिसमें से दो फुटबाल बगैर रगड़ खाए गुजर सकते थे। दरवाजे के बाईं ओर तीन जंग खाए कनस्तरों पर दफ्तर का साइनबोर्ड रख कर बजता हुआ सोफा बना दिया गया था। यह आसन समालोचकों के लिए सुरक्षित था। हमें प्रकाशित की जा सकने वाली रसीली कहानियों के एक पुलिंदे पर बिठा दिया गया, जिनकी गर्मी भी अभी ठीक से नहीं निकली थी। बराबर वाले कमरे से हर उम्र के बच्चों की आवाजें आ रही थीं। दफ्तर की दीवारें देखकर लगता होता था कि यहाँ स्लेट का चलन नहीं है। कुछ देर बाद उन्हीं में का एक बच्चा एल्यूमीनियम का एक जग ले कर आया और पूरब का पेय यानी शुद्ध पानी का दौर चला। पानी वाकई निहायत साफ था। इतना साफ कि गिलास का गंदा पेंदा साफ नजर आ रहा था। जरा देर में सब छक गए तो पान पेश किए गए जिन्हें उस बार गिलौरी कहने में इसलिए हिचकिचाहट है कि वह इतने नन्हे-मुन्ने थे कि छालियों के दाने इन में नहीं समा सकते थे, इसलिए छालियाँ अलग से पेश की गईं। हाँ तंबाकू पर्याप्त मात्रा में था। जिसका जितना जी चाहे, खा ले।

इस आवभगत के बाद जलसे की कार्रवाई शुरू हुई। चार नामचीन समीक्षकों ने प्रोफेसर काजी अब्दुल कुद्दूस, एम.ए., बी.टी. (गोल्ड मैडलिस्ट) की पुस्तक 'टी.एस. इलियट और शेख इमामबख्श नासिख की तुलना' पर निबंध पढ़े। यूँ तो प्रोफेसर साहब ने यह लेख पच्चीस साल पहले अपने छात्र-जीवन में लिखा था, मगर समीक्षकों ने इस पर नए दृष्टिकोण से रोशनी डाली थी।

आखिर में मिर्जा अब्दुल कुद्दूस बेग ने समाप्ति संबोधन पढ़ कर दोस्ती का हक अदा किया। उन्होंने 'बैंक आफ चाकसू, साहित्यिक पुरस्कार' का एक क्रांतिकारी प्रस्ताव भी पेश किया। प्रस्ताव यह था कि कुछ कलम के धनी ऐसे हैं, जो अगर लिखने की हरकत छोड़ दें तो उर्दू पर बड़ा अहसान होगा। बैंक ऑफ चाकसू प्राइज इन्हीं अहसान करने वालों की सेवा में पेश किया जाएगा। इस बात की पूरी छान-बीन करने के बाद कि किस लेखक ने साल-भर कुछ नहीं लिखा है, जज सालाना फुसलावे का एलान करेंगे। पुरुस्कार प्राप्त लेखक अगर कागज-कलम का साल भर पोषण करने से सीधी तरह बाज आ जाए तो उचित पेन्शन का अधिकारी होगा, जो अच्छे चाल-चलन की शर्त पर उसे हर महीना मिलती रहेगी। अगर समय पर मौत हो जाए तो विधवा के लिए उपयुक्त राशि भी नियत की जाएगी। बशर्ते कि वह तमाम अनछपी कृतियाँ जो स्वर्गीय चोरी-छिपे लिखते रहे, उनके साथ ही दफ्न कर दी जाएँ।

इस पर हमने जोर-जोर से तालियाँ और पास वाला कनस्तर बजाया और अल्लाह जाने कब तक बजाते रहते अगर मिर्जा यकायक यह एलान न कर देते कि इस सिलसिले के पहले पुरस्कार का अधिकारी सारे पाकिस्तान में हम यानी इस लेखक से अधिक और कोई नहीं।

हमारी यह दुर्गत सप्ताह में चार-पाँच बार जुरूर बनती थी। इस लिए कि सप्ताह में चार-पाँच बार प्रोफेसर के सम्मान में कहीं न कहीं स्वागत-समारोह अवश्य होता था, जहाँ पहली पंक्ति में ताली बजाते हुए फोटो खिंचवाने का कार्यभार हमारे जिम्मे होता था। मिर्जा कहते हैं कि बड़े आदमियों के भाषण के बाद तुम्हारी ताली बिल्कुल अलग से सुनाई देती है। दफ्तर में अपनी व्यस्तता के बारे में दिन-भर बातें करके प्रोफेसर स्वयं को बुरी तरह थका लेते थे। एक उम्र तक नेकी और नाकामी का जीवन बिताने के बाद अब वह जहाँ दिखाई पड़ते, गोटे के हार पहने उद्घाटन के फीते काटते दिखाई पड़ते। यहाँ तक सुनने में आया कि इन तमाम दावतों का खर्च प्रोफेसर स्वयं उठाते हैं, सिर्फ एक स्वागत आयोजन का भार उन्होंने नहीं उठाया। इसका विस्तृत विवरण हम दे चुके हैं। सात-आठ महीने तक तो उनकी नियुक्ति की खुशी में दावतें होती रहीं और उसके बाद संभवतः उस खुशी में कि वह अभी तक बरखास्त नहीं हुए थे। हो यह रहा था कि सस्ती और फिल्मी पत्रिकाएँ बैंक के विज्ञापन की घात में रहतीं और मौका पाते ही (जो प्रोफेसर निरंतर देते रहते थे) नपा-तुला वार कर जातीं। यानी प्रोफेसर का लेख 'शेख इमामबख्श 'नासिख' और 'टी.एस. इलियट' की तुलना' शब्दशः छाप देते। प्रोफेसर गरीब अब 'तुलना' को जितना दबाना और छिपाना चाहते, पत्रिकाएँ उतना ही उसे उछालतीं। गोया लेखक को उसी के लेख से ब्लैकमेल कर रहे थे। प्रोफेसर को शहर के एक-एक बुक स्टाल से ऐसे अंकों की सारी प्रतियाँ बैंक के खर्च पर खरीद कर जलानी पड़तीं ताकि लोग 'तुलना' न पढ़ पाएँ। अब वह गड़े मुर्दे को उखड़वा कर रूह फुंकवाते-फुंकवाते तंग आ चुके थे। मजबूरन 'तुलना' की जगह बैंक ऑफ चाकसू के बारह विज्ञापन बुक करके एडीटर के मुँह पर एक साल के लिए सोने का ताला लगा देते।

प्रोफेसर को उनके अतीत के मलबे से खींचकर निकालने का सेहरा मिर्जा के सर है। उनके बौद्धिक-स्थापन में जो कठिनाइयाँ आईं उनको इस संक्षिप्त लेख में समेटना हमारे बस की बात नहीं। प्रोफेसर को अच्छे-बुरे का ज्ञान था और अगर विचारशक्ति फ्रांस की शैंपेन से प्रभावित न हो तो काले और सफेद में फर्क भी पहचान सकते थे बशर्ते कि उन रंगों का संबंध नारी की चमड़ी से हो। मगर छोटे-बड़े व्यापारी की पहचान? यह सवाल उन्हें हमेशा कोर्स से बाहर का नजर आता। किसी का बैंक बैलैंस माथे पर तो लिखा होता नहीं। चुनांचे एक दो महीने तक यह रवैय्या रहा कि अगर कोई शख्स मैला-मसला कुर्ता पायजामा पहने, दाढ़ी बढ़ाये, अँगूठे और तर्जनी से बाछों तक की पीक पोंछता, बगैर कार्ड भेजे कमरे में मुँह उठाए चला आता तो उसे धक्के देकर तो न निकालते मगर इस तरह पेश आते कि उस कष्ट की जुरूरत न पड़ती। गलत उर्दू बोलने वालों को चाय तक के लिए न टोकते लेकिन जब पहली ही बोर्ड मीटिंग में उन्हीं में से चार लोगों को डायरेक्टरों की लाल मखमल की कुर्सियों पर आसीन देखा (जिनसे अपने कमरे में उन्होंने हाथ भी नहीं मिलाया था ताकि बाद में रगड़-रगड़ कर न धोना पड़े) तो उनकी आँखें खुल गईं और चार अंकों वाला वेतन खतरे में नजर आने लगा। फिर तो दिल में ऐसा हौल बैठा कि सड़क पर कोई भी मैले-कुचैले कपड़ों में नजर आ जाता तो फौरन सलाम कर लेते।

प्रोफेसर की बौखलाहट से उनकी महती जिम्मेदारियों का अंदाजा होता था और उन महान योग्यताओं का भी जिनके बगैर वह बखूबी गुजारा कर रहे थे। हवास बेहवास, जुबान खिचड़ी, लबो-लहजा उखड़ा-उखड़ा और बात भी कुछ ऐसी ही थी। ध्यान तो दीजिए। अभी मुल्तान के चमड़े और पशमीना के साथ इस पर शर्त बदी जा रही है कि हाजियों के पहले जहाज की वापसी पर तेजाबी सोने का भाव कितना गिरेगा और अब FANNY HILL के रक्तचाप बढ़ाने वाले गंद्याश मेज की दराज से निकाल कर सुनाए जाने लगे। पाँच मिनट पहले एक विज्ञापन माँगने वाले से हाथापाई होते-होते रह गई थी कि उसने मुँह भर कर यह कह दिया था कि आप हिर-फिर के अंधों को ही रेबड़ी बाँटते हैं और इस समस्या पर बहस हो रही है कि पानी की नदियों से जो नुकसान पूर्वी पाकिस्तान को हुआ है, उससे बैंकों की ब्याज-दर और उर्दू रुबाई पर क्या असर पड़ेगा। एक रिसीवर यह कह कर रख दिया कि 'जरा एक मिनट इंतजार कीजिए मैं हाँगकाँग डॉलर का भाव अभी मालूम करके बताता हूँ।' दूसरे फोन पर यकायक अपना गियर बदल कर कहने लगे, 'वाह! वाह! क्या फड़कती हुई पंक्ति निकाली है। जरा पाँच मिनट बाद दूसरी भी प्रदान करें।' मगर दूसरी पंक्ति वाली घंटी पाँच के बजाय दो मिनट बाद ही बजने लगी। 'हैलो! हैलो! वल्लाह क्या तेवर है? बिल्कुल मोमिन का सा अंदाज है। हाय? क्या कहा? मोमिन ही का शेर है। लाहौल विला कुव्वत। मैं तो समझा आप का है मगर मोमिन की भी क्या बात है। कभी-कभी जालिम बिल्कुल आप ही के अंदाज में शेर कह जाता है।'

कारोबारी दुनिया में आम तौर से शेरो-शायरी की गुंजाइश नहीं होती मगर प्रोफेसर ने निकाल ली थी। महीनों तक यह हाल रहा कि एक दो वाक्यों के बाद एक शेर झाड़ देते थे और यह वाक्य भी शायद शेर की प्रशंसा या प्रस्तावना के बतौर होते थे, वरना अगर उन्हें छूट दे दी जाती तो बैंकिंग के पेचीदा से पेचीदा मसले का दो टूक फैसला दीवाने-हाफिज से फाल निकाल के कर सकते थे। मिर्जा एक बार उनसे मिलने गए तो क्या देखते हैं फार्मिका की चंद्राकार मेज के गिर्द अच्छे गले और अच्छे पेट वाले शायरगण खाने-पीने की चीजों के साथ न्याय कर रहे हैं और बैंक में दिनदहाड़े मुशायरा लूट रहे हैं। टेलीफोन का रिसीवर उतार कर शायर के सामने रख दिया गया है ताकि मुशायरे का कार्यक्रम सिबगे तक 'रिले' किया जा सके जो चार मील दूर सदर में अपनी किताबों की दुकान में डेढ़ घंटे से बाएँ हाथ में फोन लिए बैठे हैं और दाएँ हाथ से ग्राहकों को इस समय किताबें खरीदने से मना कर रहे हैं। शायर को कभी-कभी रिसीवर कान से लगाकर सिबगे की दाद सुनवा दी जाती है और वह उठकर लखनवी अंदाज से फोन को आदाब बजा लाता है।

मिर्जा गरीब तो किसी काम से गए थे लेकिन दरवाजे की दरज में से झाँक कर यह नक्शा देखा तो सरकारी काम को उनकी तफरीह में बाधक पाकर उलटे पाँव वापस लौट आए। शेरो-शायरी से मिर्जा की अकवितामय प्रवृति यूँ भी दबा करती है और मुशायरों से तो वह कोसों दूर भागते हैं। विशेष रूप से बड़े मुशायरों से। कहते हैं, 'साहब! जो शेर एक ही समय में पाँच छह हजार आदमियों की समझ में आ जाए वह शेर नहीं हो सकता। उसमें जुरूर कुछ-न-कुछ खोट निकलेगा।' मिर्जा ने जब यह देखा कि प्रोफेसर को गद्य में अपने विचारों को प्रकट करने में बड़ी दुश्वारी होने लगी है तो समझाने बैठ गए। 'प्रोफेसर! यह साहूकारा संसार है। सही उर्दू से गुजराती सेठ बेहद रोब खाता है लेकिन सौदा बिगड़ जाता है। किसी ने मुझे बताया कि दो सेठ अलग-अलग समयों में तुम्हारे बैंक में खाता खोलने आए लेकिन एक मेमन को तो तुम्हारी सिक्रेटरी ने घुसने नहीं दिया और दूसरे व्यापारी ने, जो रकम जमा कराने आया था, तुम्हें बैंक में देखकर फौरन अपना इरादा बदल दिया और अपनी जमापूँजी टोपी में छुपा के कहने लगा कि मैं तो दरअस्ल ओवर ड्राफ्ट लेने आया था। कमाल तो यह कि तुमने वाकई उसे ओवर ड्राफ्ट दिलवा दिया, जिससे उसने उसी वक्त दूसरे बैंक में जाकर अकाउंट खोल लिया और यूँ अहले-दर्द को पंसारियों ने लूट लिया।

मिर्जा उन्हें शेर सुनने से रोक सकते थे, लेकिन शेर सुनाने पर कैसे पाबंदी लगाई जा सकती थी। प्रोफेसर सामने बैठे हुए शायर की पंक्ति उठाने से इनकार कर सकते थे लेकिन उनका मुँह कैसे बंद करते जो बातचीत की फुरसत को गनीमत जान कर फोन पर ही खून थूकने लगते थे। एक दिन प्रोफेसर बुरी तरह बौखलाए हुए थे क्योंकि आधे घंटे बाद बोर्ड आफ डायरेक्टर्स की मीटिंग थी जिसमें बैंक का पब्लिसिटी बजट, पास करने और गाली-गलौज के लिए पेश होने जा रहा था। उनकी सूरत ऐसी हो रही थी जैसी विज्ञापनों में उनकी होती है जिनको हॉरलिक्स की जुरूरत होती है। मेज पर कागजों का अंबार लगा हुआ था। कमरे के बाहर लालबत्ती जल रही थी जिसका मतलब यह था कि आज वह वाही-तबाही आदमियों यानी अपने खास दोस्तों से भेंट नहीं करेंगे।

इतने में सफेद टेलीफोन की बैठी-बैठी आवाज वाली घंटी बजी और दूसरे सिरे से गोदाम-कीपर के पद के एक उम्मीदवार हजरत मदहोश माधोपुरी ने अपने उपनाम जैसे सुर में अपनी नवलिखित मुसद्दस (छह पंक्तियों के बंद वाली कविता) सुनानी शुरू की। हरचंद कि यह तोड़ का वक्त था और प्रोफेसर को सिगरेट की राख तक झाड़ने की फुरसत न थी, लेकिन मुसद्दस के शुरू के बंद इन्हीं की प्रशंसा में थे और अल्लाह के करम से इसमें इस कदर अतिश्योक्ति से काम लिया गया था कि फोन बंद करने को किसी तरह जी न चाहा। खुदा जाने कब का लिया-दिया आड़े आ गया कि फोन खुद-ब-खुद बीस मिनट बाद खराब हो गया और प्रोफेसर अपनी नीली बो ठीक करते हुए बोर्ड-रूम की तरफ भागे। मीटिंग एक बजे खत्म हो गई लेकिन फोन शाम तक खराब रहा। प्रोफेसर ने जानबूझकर उसे ठीक नहीं कराया, इसलिए कि वह अपनी सिक्रेटरी को एकाग्रता के साथ मीटिंग की कार्रवाई लिखवाना चाहते थे। टेलीफोन ऑपरेटर ने भी फोन मिलाने बंद कर दिए थे और चंद घंटे कुशलपूर्वक गुजरे। वह कार्रवाई लिखवा रहे थे कि यकायक सफेद फोन की घंटी आप ही आप बजने लगी। वह उछल कर अपनी सिक्रेटरी की गोद में जा गिरे और देर तक वहीं बेसुध पड़े रहे। इसी स्थिति में उसके चिकौटी काट कर देखा कि जाग रहा हूँ या सो रहा हूँ। जब उसने पटाख से गाली दी तो उन्हें यकीन आया कि सपना नहीं है। रिसीवर उठाकर बोले, 'हैलो! काजी अब्दुल कुद्दूस हियर। हैलो! हैलो, काजी दिस साइड!' उधर से आवाज आई, 'जी! बजा इरशाद फरमाया! मगर मैं तो मदहोश माधोपुरी अर्ज कर रहा हूँ। वल्लाह! सुबह दस बजे से आप का फोन ठीक कराने में लगा हुआ हूँ। खुदा झूठ न बुलवाये, दस जगह शिकायत नोट कराई होगी। अंत में झक मार कर खुद टेलीफोन एक्सचेंज गया और एक-एक की खबर ले डाली। जब कहीं जाकर पाँच बजे आप की घंटी बजी है। जी! तो अर्ज किया है - '

और वह छह बजे तक अर्ज करते रहे

कोई दिन खाली जाता होगा कि लज्जित होने और पगलौट का कोई नवीन अवसर न आए। एक दिन (संभवतः सोमवार था जिसे मिर्जा काला दिन कहते हैं और अक्सर भविष्यवाणी करते हैं कि देख लेना, प्रलय सोमवार को ही आएगी) बैंक में उदास बैठे अपने विशिष्ट अंदाज से यानी पियाली होंटों से लगाते वक्त छंगुलिया उठाए हुए - फ्रेंच काफी पी रहे थे। आदत के अनुसार जोर से आँखें सुकेड़ रखी थीं। हालाँकि उस समय उनके चाँद से चेहरे के चारों ओर सिगरेट के धुएँ का घेरा नहीं था। काफी के हर घूँट के बाद बाएँ हाथ से इस खयाली धुएँ को हटाते जाते थे कि मिची-मिची आँखों में न घुसने पाए। इतने में पत्रिका 'मीना-बाजार' की एडीटर आ निकलीं। प्रोफेसर ने कहा, 'आप पच्चीस साल से बिल्कुल वैसी की वैसी ही हैं। बहुत खुशी हुई।' हालाँकि प्रोफेसर का मतलब दरअस्ल यह था कि जैसी बदसूरत आप पच्चीस साल पहले थीं, वैसी ही अब भी हैं। सम्माननीय ने 'मीना बाजार' का नवीन अंक पेश किया। प्रोफेसर टाइटिल पेज पर अपनी तस्वीर देखकर भौंचक्के रह गए। सब से तकलीफदेह बात यह थी कि तस्वीर बिल्कुल उनसे मिलती थी। बेहतर न थी।

'मीना बाजार' में विज्ञापन निकलना था कि तमाम महिला पत्रिकाओं ने हमला कर दिया और प्रोफेसर सोचते ही रह गए -

खाऊँ किधर की चोट, बचाऊँ किधर की चोट

'आँचल' से जो ऐतिहासिक मुचैटा हुआ, उसके डायलॉग पाक बोहेमियन काफी हाउस के बैरों तक को रटे हुए हैं। प्रोफेसर को उक्त संपादक से पहली नजर में नफरत हो गई। वह तो खैरियत हुई वरना प्रोफेसर का सीना अगर 34 इंच के बजाय 43 इंच का होता तो, पहली ही मुलाकात में कचूमर बना देते। यह पत्रिका पैंतीस साल से उन्हीं औरतों की सेवा किए जा रही थी, जो उस वक्त पैंतीस साल की थीं जब पत्रिका का पहला अंक निकला था। किस्सा कहानी की ओट में यही शरीफ बीबियाँ अपनी हमउम्र बीबियों को और अधिक शरीफ रहने का पाठ पढ़ाती रहती थीं। पत्रिका ऐसी नग्न कहानियों से बिल्कुल पवित्र थी जिनसे हर शख्स अपनी कुरुचि के अनुसार रस ले सके। कामुक कहानियों के बजाय रिसाले में कुँवारी बालियों को पलंग की चादर पर क्रोशिये से 'खुश आमदीद' काढ़ने की तरकीबें सिखाई जाती थीं। साहित्यिक रुचि इतनी बदल गई थी कि जो शायर 25 बरस पहले दुनिया को मायाजाल समझते थे, वह अब उसे पूँजी का जाल कहने लगे थे। लेकिन 'आँचल' के लिखने वाले आज भी औरतों को 'मस्तूरात' कहते और माहौल पर लाहौल भेजते हैं। नई काट की चोली में इन बुजुर्गों को 'प्रलय' के चिह्न दिखलाई देते हैं। हालाँकि हमारे मिर्जा अब्दुल वुदूद बेग तो उलटी तमन्ना करते हैं कि साहब! प्रलय की सचमुच यही निशानियाँ है तो फिर जल्दी से सूरज सवा नेजे पर आ जाए कि जिंदगी का कुछ भरोसा नहीं। और साहब! जिंदगानी गर रही तो नौजवानी फिर कहाँ! 

संपादक महोदय ने आते ही फरमाया कि तुलनात्मक अध्ययन की टक्कर की कोई चीज आँचल के लिए प्रदान करें। प्रोफेसर ने उन्हें सूचित किया कि व्यस्तता की वज्ह से पिछले पच्चीस साल से कुछ नहीं लिख सके। नेह-बोधन के बाद मंतव्य प्रकट किया 'विज्ञापन चाहिए।' प्रोफेसर ने दलील दी कि सालाना बजट खत्म हो चुका है। फरमाया, 'चलिए! कोई हरज नहीं। बैंक के रजिस्टरों और फार्मों का सालाना आर्डर ही आँचल प्रेस को इनायत फरमाइए।' प्रोफेसर ने जवाब दिया, 'मगर सात लाख रुपए की स्टेशनरी आप एक ट्रेडिल मशीन पर दस बरस में भी नहीं छाप सकेंगे।' बोले, 'तो फिर बैंक से पचास हजार का 'क्लीन ओवरड्राफ्ट' ही दिलवा दीजिए।

प्रोफेसर के सब्र का पैमाना छलक गया। दफ्तरी सहनशीलता और एहतियात को एक तरफ रखते हुए बोले, 'आप की माँगों का क्रम बिल्कुल उल्टा है। खुदा की कसम बिल्कुल उल्टा। चाहिए तो यह था कि आप पहले पचास हजार कर्ज माँगते। इसके बाद स्टेशनरी के आर्डर की फरमाइश करते। यह भी नहीं मिलता तो विज्ञापन माँगते। फिर भी इनकार करता तो लेख माँगते। फिर मेरी हिम्मत नहीं होती कि इनकार करता। शर्मा-शर्मी लेख तो दे ही देता।'

महोदय बोले, 'अरे साहब। यही तो मुझे डर था।'

बाल-पत्रिकाएँ हमेशा से उनके वात्सल्य से वंचित थीं। अंततः यह अधर्म इस तरह टूटा कि पत्रिका 'बाजीचा-ए-अतफाल' (बच्चों का खेल) ने एक विशाल 'विज्ञापन विशेषांक' निकालने का एलान किया और इसके बाद इस पत्रिका पर भी बैंक के विज्ञापनों की कृपा होने लगी। अल्लाह जानता है कि वह 'विज्ञापन विशेषांक' पर रीझ गए या उसकी संपादिका कुमारी सुमंता फरजूक की अँखियों की कटार से लालसापूर्ण ढंग से ढेर हो गए। सफेद शलवार, सफेद कमीज, सफेद दुपट्टा, सीधी माँग, नंगे हाथ, नंगे कान। हमें तो वह किसी तरफ से ऐसी नहीं लगती थी कि आदमी के पाँचों इंद्रियों पर डाका डाल सकें या पहली ही मुलाकात में प्रोफेसर के ईमान के किले की ईंट से ईंट बजा दें लेकिन याद रहे कि प्रोफेसर कुँवारे थे। चालीस साल के थे और हाल ही में हुई जनगणना में अपनी गिनती मर्दों में करवा चुके थे। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हमारे हीरो ने आज तक कोई औरत ऐसी नहीं देखी जिसको वह नापसंद कर सके। किनारे को तरसा हुआ नाविक हर उथली खाड़ी में लंगर डाल देता है। कुमारी सुमंता ने आते ही खुशखबरी सुनाई कि उन्होंने 'तुलना' का बच्चों के लिए आसान उर्दू में अनुवाद किया है। हाँ शीर्षक में थोड़ी सी तब्दीली कर दी है। यानी शेख इमामबख्श 'नासिख' के बजाय मौलवी इस्माईल मेरठी को भिड़ा दिया है। अलबत्ता शेर वही रहने दिए हैं। अब महोदया इस लेख के साथ लेखक से इंटरव्यू का वर्णन नई तस्वीर के साथ छापना चाहती थीं और इस सिलसिले में सनीचर चाय पर निमंत्रित करने आई थीं। प्रोफेसर ने बहुतेरी क्षमा याचना की कि सनीचर की शाम को मुझे बहुत काम है। तीन काकटेल पार्टियों में एक के बाद एक शिरकत करनी है लेकिन वह न मानी। लगातार इनकार से उनकी आँखों में आँसू तैरने लगे।

प्रोफेसर को आँसुओं की जरा बर्दाश्त नहीं। बल्कि सच तो यह है कि औरत की किसी चीज की सहार नहीं।

चुनांचे तय यह पाया कि प्रोफेसर तीनों काकटेल पार्टियों को लश्तम-पश्तम भुगता कर साढ़े सात बजे तक उनके घर पहुँच जाएँगे।

प्रोफेसर का अपना बयान था कि उन्होंने तीनों काकटेल पार्टियों में अपने 'प्रोटोकोल' के कर्तव्य को पूरा करने में 'अपनी तरफ से तो कोताही में कोई कमी नहीं की।' मिर्जा के कंधे पर अपना सारा बोझ डाले वह जिमखाने से शराबखाने को हथेली पर रखे कुमारी सुमंता के यहाँ चाय पीने पहुँचे तो दस बज रहा होगा। जिस वक्त वह अपनी तीस हाथ लंबी केडिलक से उतरे हैं तो मिर्जा के बयान के मुताबिक उनका दायाँ पाँव उस जगह पड़ रहा था जहाँ बायाँ पड़ना चाहिए था और जिन अक्षरों की आवाजें किसी-किसी के मुँह से निकलती हैं वह उनकी नाक से सरलता से निकल रही थीं। गैलरी से गुजरते वक्त उन्होंने एक गिरती हुई दीवार को अपनी पीठ से सहारा देने की कोशिश भी की। फिर इंटरव्यू शुरू हुआ और टेपरिकॉर्डर चलने लगा।

मिस सुमंता ने चंद रस्मी सवालात के बाद पूछा कि आप अभी तक कुँवारे हैं। किस किस्म की बीवी अपने लिए पसंद करेंगे? प्रोफेसर ने झूमते हुए फरमाया कि मुझे आधुनिक विचारों की बीवी बहुत पसंद है - बशर्ते कि वह किसी दूसरे की हो। महोदया ने पल्लू मुँह में ठूँसते हुए पैदायश का सन पूछा तो प्रोफेसर ने 2419 बताया और स्पष्ट करने के लिए AD (ईसवी) भी कहा ताकि सुनने वाले को भ्रम न हो। महोदया ने इतरा कर कहा, 'मगर आप तो शक्ल से सिर्फ चालीस साल के लगते हैं। इसका क्या कारण है?' प्रोफेसर ने जवाब दिया, 'इसका एक कारण तो यह है कि मैं चालीस ही साल का हूँ।' फिर दूसरे कारण की व्याख्या और संचार करते हुए फरमाया, उपन्यासकार जार्ज मूर से किसी पत्रकार ने पूछा कि आप अस्सी साल की उम्र में भी गोरे-चिट्टे रखे हैं, उसका क्या राज है? उसने जवाब दिया, 'मैंने शराब, सिगरेट और सेक्स को बिल्कुल हाथ नहीं लगाया - जब तक मैं ग्यारह साल का न हो गया।'

हमारे एक-पक्षीय बयान से यह न समझा जाए कि प्रोफेसर तरंग में अपने ही गुण समझाते रहे। उनकी नजर दूसरों पर भी थी। उदाहरण के लिए उन्होंने महोदया का ध्यान एक ऐसे गुण की तरफ आकर्षित किया जिससे वह बिल्कुल बेखबर मालूम होती थीं। 'आप की पसंद' का सवाल आया तो प्रोफेसर ने - मोतिया, मुसहफी, सनीचर की शाम, हेनरी मिलर, महावट, दाल भरे गर्म पराँठे, रेशमी दुलाई, नीग्रो कुँवारी की चर्चा करते करते - 'भई! आप का दायाँ कान सचमुच बहुत खूबसूरत है।'

ऐसे सूखे मुँह से कहा कि महोदया के बाएँ कान को यकीन नहीं आया कि उनका दायाँ कान क्या सुन गया। मिर्जा कहते हैं कि सुमंता फरजूक के दोनों कानों में स्पष्टतया कोई फर्क नहीं था लेकिन प्रोफेसर ने दाएँ को विशिष्टता शायद एहतियात के कारण दी थी, इसलिए कि उन्हें केवल दायाँ कान ही दिखाई पड़ रहा था। बहरहाल यह वाक्य भी रिकार्ड हो गया और उसके साथ वह हिचकियाँ भी जो उनके मद्य-वृतांत में हर शब्द के बाद फुलस्टॉप लगा रही थीं। प्रोफेसर ने जब तीसरी बार यह गुण-गान देवी जी के कान में उँड़ेला तो उन्होंने टेपरिकॉर्डर आहिस्ता से स्विच ऑफ कर दिया और सफेद दुपट्टा अपने सर पर इस तरह लपेट लिया जैसे सचरित्र बीबियाँ नमाज पढ़ते वक्त लपेट लेती है। जैसे ही वह चाय लेने अंदर गईं तो मिर्जा के गले में हाथ डालकर कहने लगे -

'उनका दायाँ कान वाकई बहुत खूबसूरत है।'

बीच में मिर्जा ने दो तीन बार आँखों ही आँखों में उठने का इशारा किया तो प्रोफेसर ने इस तरह हाथ घुमाया जैसे चक्की पीस रहे हों। इसका मतलब था वह वहीं मिर्जा का कचूमर बना देंगे।

वह मेज पर ट्रे रखने को झुकीं तो प्रोफेसर ने चुपके से दाएँ कान में वही जुमला दोहरा दिया। अब की बार देवी जी ने जो ढाठा बाँधा तो अंत तक नहीं खोला। खुदा-खुदा करके पौने बारह बजे इंटरव्यू अपने अंत को इस तरह पहुँचा कि प्रोफेसर को वाक्य के बीच में नींद आ गई। मिर्जा ने मुँह पर पानी के छपके देकर जगाया। महोदया चंद मिनट बाद महोदय को कार में सवार कराने बाहर पधारीं। विदा के समय आदाब बजा लाने के लिए उन्होंने अपनी सुराहीदार गरदन झुकाई तो दुपट्टे का ऐंडवा फिर सीने पर आ रहा और प्रोफेसर ने जवाब में तर्जनी उठाते हुए फरमाया।

'आदाब! और बायाँ भी -'

और वह झेंप कर दाएँ-बाएँ कानों पर हाथ रखे अंदर भाग गईं।

सुबह मिर्जा ने प्रोफेसर को उनकी रात की कथनी और करनी से आगाह किया तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि उनसे ऐसी हरकत भी हो सकती है। उसी समय जाकर उस नेक बीवी से क्षमा माँगने की जिद करने लगे। मिर्जा ने बड़ी कठिनाई से रोका। उस रात उन्हें शर्म के मारे नींद नहीं आई। नींद तो दूसरी रात भी नहीं आई मगर किसी और कारण से। वो कारण यह था कि महोदया स्वयं बैंक में पधारीं और कहने लगीं कि एक पुर्जे के कारण रात इंटरव्यू ठीक से रिकार्ड नहीं हुआ इसलिए दोबारा चाय पर पधारने की कृपा करें।

और हाँ! आज वह दोनों कानों में मोतिये की कलियों की बालियाँ पहने थीं। कान की लौ न जाने कितनी बार गुलाबी हुई होगी। जब वो विदा हुईं तो एक कली खिल चुकी थी।
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मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
उर्दू के व्यंग्यकार और हास्य लेखक
साभार: हिन्दी समय

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