गुरुवार, 12 दिसंबर 2019

बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता - निदा फ़ाज़ली

बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता 
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता॥

सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें 
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता॥

वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में 
जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता॥

मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा 
जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यूँ नहीं जाता॥

वो ख़्वाब जो बरसों से न चेहरा न बदन है 
वो ख़्वाब हवाओं में बिखर क्यूँ नहीं जाता॥
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4 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (13 -12-2019 ) को " प्याज बिना स्वाद कहां रे ! "(चर्चा अंक-3548) पर भी होगी

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का

    महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।

    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।

    आप भी सादर आमंत्रित है 
    ….
    अनीता लागुरी"अनु"

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    1. चर्चा में स्थान देने के लिए सादर धन्यवाद।

      हटाएं
  2. शब्द नहीं है बहुत ही खूबसूरत लिखा है आपने दिल को छू गई आपकी ग़ज़ल

    जवाब देंहटाएं