रविवार, 15 दिसंबर 2019

मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे - गुलज़ार

मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे 
अक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनते 
जब कोई तागा टूट गया या ख़तम हुआ 
फिर से बाँध के 
और सिरा कोई जोड़ के उसमें 
आगे बुनने लगते हो 
तेरे इस ताने में लेकिन 
इक भी गाँठ गिरह बुनकर की
देख नहीं सकता है कोई 
मैंने तो इक बार बुना था एक ही रिश्ता 
लेकिन उसकी सारी गिरहें 
साफ़ नज़र आती हैं मेरे यार जुलाहे
मुझको भी तरकीब सिखा दे यार जुलाहे।
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गुलज़ार

3 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (16-12-2019) को "आस मन पलती रही "(चर्चा अंक-3551) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं…
    *****
    रवीन्द्र सिंह यादव

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  2. बहुत ही सुन्दर सार्थक कृति..
    इक भी गाँठ गिरह बुनकर की
    देख नहीं सकता है कोई
    मैंने तो इक बार बुना था एक ही रिश्ता
    लेकिन उसकी सारी गिरहें
    साफ़ नज़र आती हैं मेरे यार जुलाहे
    मुझको भी तरकीब सिखा दे यार जुलाहे।
    वाह!!!!

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  3. उम्दा और सार्थक सृजन ।
    हमेशा लाजवाब गुलजार साहब।

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