मंगलवार, 6 जुलाई 2021

तुम आयीं - केदारनाथ सिंह

तुम आयीं
जैसे छीमियों में धीरे- धीरे
आता है रस
जैसे चलते - चलते एड़ी में
काँटा जाए धँस
तुम दिखीं
जैसे कोई बच्चा
सुन रहा हो कहानी
तुम हँसी
जैसे तट पर बजता हो पानी
तुम हिलीं
जैसे हिलती है पत्ती
जैसे लालटेन के शीशे में
काँपती हो बत्ती !
तुमने छुआ
जैसे धूप में धीरे- धीरे
उड़ता है भुआ

और अन्त में
जैसे हवा पकाती है गेहूँ के खेतों को
तुमने मुझे पकाया
और इस तरह
जैसे दाने अलगाये जाते है भूसे से
तुमने मुझे खुद से अलगाया ।
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केदारनाथ सिंह



4 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (०७-०७-२०२१) को
    'तुम आयीं' (चर्चा अंक- ४११८)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  2. और अन्त में
    जैसे हवा पकाती है गेहूँ के खेतों को
    तुमने मुझे पकाया
    और इस तरह
    जैसे दाने अलगाये जाते है भूसे से
    तुमने मुझे खुद से अलगाया ।---बहुत ही गहन रचना और इसमें भी मेरी पसंदीदा पंक्तियां...। खूब बधाई आपको आदरणीय केदारनाथ िंसंह जी।

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  3. वाह अद्भुत अभिव्यंजनाएं! श्रृंगार में ये कठोरता के भाव उल्हाना ही नहीं गुस्सा भी दिखा रहा है।
    अभिनव।

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  4. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।

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